नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि मानवाधिकारों पर चर्चा सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका केंद्र सबसे कमजोर वर्ग के लोगों के जीवन में ठोस सुधार लाना होना चाहिए। उन्होंने यह बात संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में अपने वर्चुअल संबोधन के दौरान कही।

जयशंकर ने जोर दिया कि संघर्ष, ध्रुवीकरण और अनिश्चितता से घिरी दुनिया में भारत संवाद और साझा हितों के जरिए स्थिरता स्थापित करने की दिशा में काम करता है। उनके अनुसार, "हमने टकराव की बजाय संवाद, विभाजन की बजाय सहमति और संकीर्ण हितों की बजाय मानव-केंद्रित विकास पर हमेशा जोर दिया है।"

आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस
विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद को आतंकवादी कृत्यों के लिए शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद मानवाधिकारों के सबसे गंभीर उल्लंघन में से एक है और इसके लिए कोई औचित्य नहीं हो सकता, खासकर जब निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया जाता है।

मानवाधिकार परिषद में भारत का स्थान
भारत को हाल ही में मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना गया है। इसे 188 में से 177 मत प्राप्त हुए। जयशंकर ने कहा कि यह वैश्विक समुदाय, विशेषकर वैश्विक दक्षिण के देशों के भरोसे को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत राजनीति और चयनात्मक मानदंड के बजाय संवाद, साझेदारी और क्षमता निर्माण पर विश्वास करता है।

मानवाधिकारों की रक्षा में भारत की प्रतिबद्धता
जयशंकर ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत सभी लोगों के लिए समानता और सम्मान के आधार पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उदाहरण देते हुए बताया कि इससे करोड़ों लोगों को सरकारी सुविधाओं, वित्तीय सेवाओं और कल्याण योजनाओं तक पारदर्शी पहुंच मिली है, और यह अनुभव भारत वैश्विक स्तर पर साझा कर रहा है।

जयशंकर ने यह भी कहा कि महामारी, जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक दबावों ने असमानताओं को और बढ़ाया है। इस कारण विकास को मानवाधिकारों की नींव के रूप में देखना और उसे प्राथमिकता देना बेहद आवश्यक है।