राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू समाज को प्रत्यक्ष खतरा नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है। उन्होंने यह बात सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक के दौरान कही।
भागवत ने हिंदू समुदाय की घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना आवश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने घर वापसी की प्रक्रिया को तेज करने और जो लोग पुनः हिंदू धर्म में लौटें, उनके संरक्षण और देखभाल पर जोर दिया।
साथ ही उन्होंने घुसपैठ और अवैध प्रवास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट किया जाना चाहिए और रोजगार उपलब्ध नहीं कराना चाहिए। उन्होंने हिंदू परिवारों में कम से कम तीन बच्चों के होने की आवश्यकता भी बताई। भागवत ने कहा कि समय के साथ उत्पन्न भेदभाव की आदत को खत्म करना होगा।
भारतीय नारी का सम्मान
सरसंघचालक ने महिला सशक्तिकरण पर भी जोर देते हुए कहा कि परिवार और समाज का आधार मातृशक्ति है। परंपरागत रूप से कमाई का अधिकार पुरुषों के पास था, लेकिन खर्च की जिम्मेदारी माताओं पर होती थी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अबला नहीं समझना चाहिए, वे “असुर मर्दिनी” हैं और परिवार में सभी का सहयोग और सम्मान सुनिश्चित करती हैं।
जातीय मतभेद और कानून का पालन
भागवत ने जातियों को झगड़े का कारण बनने से रोका और कानून का पालन करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि कानून में सुधार की आवश्यकता है तो उसके लिए उचित रास्ता अपनाया जा सकता है। समाज में अपनापन और सहयोग की भावना होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो कमजोर हैं, उन्हें समर्थन देकर ऊपर उठाना चाहिए, और संघर्ष के बजाय समन्वय से समाज आगे बढ़ता है।
वैश्विक संदर्भ में सतर्कता
डॉ. भागवत ने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में बैठे कुछ लोग भारत की सद्भावना के खिलाफ योजनाएं बना रहे हैं, इसलिए सजग रहना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच अविश्वास समाप्त करना और एक-दूसरे के दुःख-सुख में शामिल होना जरूरी है।
विविध समाज के प्रतिनिधि उपस्थित
बैठक में सिक्ख, बौद्ध, जैन समुदाय के साथ रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, जय गुरुदेव, शिव शांति आश्रम, आर्ट ऑफ लिविंग, संत निरंकारी आश्रम, संत कृपाल आश्रम, कबीर मिशन, गोरक्षा पीठ, आर्य समाज, संत रविदास पीठ, दिव्यानंद आश्रम और ब्रह्म विद्या निकेतन के प्रतिनिधि शामिल हुए।