मतदाता पहचान को और अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने की मांग से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। यह याचिका भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है, जिसमें मतदान प्रक्रिया में बायोमेट्रिक और फेस रिकग्निशन तकनीक लागू करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र और चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए मौजूदा नियमों में बड़े बदलाव की आवश्यकता होगी और इससे वित्तीय लागत भी काफी बढ़ सकती है।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय स्वयं अदालत में उपस्थित हुए और दलील दी कि इस तकनीक को लागू करने के लिए राज्यों का सहयोग भी जरूरी होगा। शुरुआत में कोर्ट ने उन्हें चुनाव आयोग के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी थी और तत्काल नोटिस जारी करने पर सहमति नहीं जताई थी।
याचिका के प्रमुख तर्क
याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव प्रक्रिया में अभी भी फर्जी पहचान, डुप्लीकेट वोटिंग, घोस्ट वोटिंग, रिश्वत और अनुचित प्रभाव जैसी समस्याएं मौजूद हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं।
चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
पीठ ने स्पष्ट किया कि पहले चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखना चाहिए। इसके बाद यह देखा जाएगा कि क्या राज्यों का सहयोग और वित्तीय मंजूरी संभव है या नहीं।
भविष्य के चुनावों पर टिप्पणी
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की व्यवस्था को तत्काल आगामी चुनावों में लागू करना संभव नहीं होगा, लेकिन भविष्य के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए इसकी व्यवहारिकता पर विचार किया जा सकता है।