मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठ रही आशंकाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि जिन मतदाताओं के नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” यानी तार्किक विसंगति की श्रेणी में डाले गए हैं, उनकी सूची ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए, ताकि कोई भी पात्र नागरिक बिना सुने जाने के अपने मताधिकार से वंचित न हो।

यह आदेश ऐसे समय में आया है जब बिहार में एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है और छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में यह प्रक्रिया जारी है। तमिलनाडु से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में त्रुटियां बताई जा रही हैं, उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

क्या होती है ‘तार्किक विसंगति’?

चुनाव आयोग ने मतदाताओं को तीन श्रेणियों में बांटा है- मैप्ड, अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी।
तार्किक विसंगति में पिता या माता के नाम में अंतर, उम्र से जुड़ी असामान्यताएं, दादा-दादी की उम्र से मेल न खाना या असामान्य रूप से अधिक बच्चों का उल्लेख जैसे मामले आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कई बार ऐसी गलतियां केवल दस्तावेजी या डेटा एंट्री से भी हो सकती हैं।

कोर्ट के मुख्य निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • तार्किक विसंगति वाली सूची पंचायत भवन, तालुका कार्यालय और शहरी वार्ड कार्यालयों में चस्पा की जाए

  • प्रभावित मतदाताओं को अपने कागजात और आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा अवसर मिले

  • मतदाता स्वयं या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए आपत्ति दे सकते हैं

  • बूथ लेवल एजेंट (BLA) को भी प्रतिनिधि बनाया जा सकता है

  • प्रतिनिधि के लिए हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान वाला प्राधिकरण पत्र अनिवार्य होगा

  • सूची प्रकाशित होने के बाद कम से कम 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाए

  • राज्य सरकारें आवश्यक स्टाफ और संसाधन उपलब्ध कराएं

  • जिला प्रशासन और पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखें

  • हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का मौका देना अनिवार्य होगा

कहां और कैसे दर्ज होगी आपत्ति?

जिन मतदाताओं के नाम विसंगति सूची में हैं, वे पंचायत भवनों, तालुका कार्यालयों या शहरी वार्ड कार्यालयों में जाकर अपने दस्तावेज जमा कर सकते हैं। वे चाहें तो किसी अधिकृत व्यक्ति या बीएलए के माध्यम से भी यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

राज्य सरकारों और प्रशासन की जिम्मेदारी

अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे चुनाव आयोग को पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराएं ताकि जांच और सुनवाई की प्रक्रिया बिना बाधा चल सके। कलेक्टर और पुलिस अधिकारियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों को सहयोग देने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।

लोकतंत्र की रक्षा पर कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटना सीधे तौर पर उसके मतदान अधिकार को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शिता और सुनवाई का अवसर लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। अदालत के मुताबिक, इन निर्देशों से मतदाता सूची की विश्वसनीयता और जनता का भरोसा दोनों मजबूत होंगे।