नई दिल्ली। अत्यधिक वसा, चीनी और नमक से भरपूर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत को लेकर आर्थिक समीक्षा 2025-26 ने गंभीर चिंता जताई है। समीक्षा में सुझाव दिया गया है कि ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों को सुबह से देर रात तक सीमित करने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि खासकर बच्चों और युवाओं पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।

संसद में प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि शिशु और छोटे बच्चों के लिए बनाए जाने वाले दूध और पेय पदार्थों के प्रचार-प्रसार पर भी कड़े नियम लागू किए जाने की जरूरत है। समीक्षा का मानना है कि इन उत्पादों का आक्रामक विपणन बच्चों की भोजन संबंधी आदतों को प्रभावित कर रहा है।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों के पैकेट के सामने वाले हिस्से पर स्पष्ट पोषण चेतावनी दी जाए और बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित करने की बात कही गई है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों को कमजोर न करें।

आर्थिक समीक्षा के अनुसार, भारत अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले डेढ़ दशक में इस श्रेणी के उत्पादों की बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसी अवधि में मोटापे और अन्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मामलों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल उपभोक्ताओं की पसंद बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए खाद्य प्रणाली से जुड़े व्यापक और समन्वित नीतिगत कदम जरूरी हैं, जिनमें जंक फूड के उत्पादन का नियमन, स्वस्थ और टिकाऊ आहार को बढ़ावा देना तथा इनके विज्ञापनों पर प्रभावी नियंत्रण शामिल है।

आर्थिक समीक्षा ने सुझाव दिया है कि सभी मीडिया माध्यमों—चाहे वे पारंपरिक हों या डिजिटल—में सुबह छह बजे से रात 11 बजे तक ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों पर रोक लगाने के विकल्पों पर विचार किया जाए। रिपोर्ट में चिली, नॉर्वे और ब्रिटेन जैसे देशों का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां इस तरह के सख्त नियम पहले से लागू हैं।

समीक्षा में यह भी कहा गया है कि मौजूदा विज्ञापन और उपभोक्ता संरक्षण नियमों में पोषण से जुड़े दावों की स्पष्ट परिभाषा नहीं होने के कारण कंपनियां ‘स्वास्थ्य’ और ‘ऊर्जा’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल कर उपभोक्ताओं को भ्रमित कर रही हैं। इस नियामकीय खामी को दूर करना समय की मांग बताया गया है।