नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित उस कानून की वैधता की जांच करने पर सहमति जताई है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके पद पर रहते हुए और रिटायर होने के बाद भी अभियोजन से सुरक्षा दी गई है। कोर्ट ने कहा कि यह देखना आवश्यक है कि क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल को न मिलने वाली यह सुरक्षा, चुनाव आयोग के अधिकारियों को दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने लोक प्रहरी एनजीओ की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और चार हफ्ते में जवाब मांगा है। यह सुनवाई सीजेआई डी. वाई. सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में हुई।

क्या है कानून?

साल 2023 में मोदी सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों से पास किया गया यह कानून मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों (जैसे चुनावी निर्णय और प्रक्रियागत कार्य) के लिए FIR या मुकदमे से सुरक्षा देता है। यह सुरक्षा वर्तमान और पूर्व दोनों आयुक्तों पर लागू होती है। यानी, पद पर रहते हुए या रिटायर होने के बाद भी इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह कानून सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद लाया गया था।

एनजीओ और विपक्ष का विरोध

लोक प्रहरी एनजीओ ने याचिका में यह तर्क दिया कि पद पर रहते हुए गलत कार्य करने के बाद मुकदमा न होना न्यायसंगत नहीं है और इससे संतुलन बिगड़ता है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने संसद में इस कानून का कड़ा विरोध किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। आगामी चार हफ्तों में यह मामला केंद्र और आयोग की ओर से दिए गए तर्कों के आधार पर आगे बढ़ेगा। राजनीतिक और न्यायिक विशेषज्ञों की निगाह इस सुनवाई पर बनी हुई है कि सरकार और चुनाव आयोग इस कानून का संरक्षण किस तरह से प्रस्तुत करते हैं।