पिता प्राकृतिक संरक्षक, बच्चे को ले जाना अपहरण नहीं: झारखंड HC का अहम फैसला

HIGHLIGHTS
- झारखंड हाई कोर्ट ने कहा- पिता द्वारा नाबालिग बेटे को साथ ले जाने पर अपहरण का मामला नहीं बनता।
- अदालत ने धनबाद के शिकायत वाद में चल रही आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश रद्द कर दिया।
- कोर्ट ने कहा- केवल सामान्य मारपीट के आरोप के आधार पर आपराधिक मामला जारी नहीं रखा जा सकता।
रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि पिता अपने नाबालिग बेटे को अपने साथ ले जाता है तो सिर्फ इस आधार पर उसके खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एके चौधरी की अदालत ने कहा कि पिता अपने बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक होता है। वहीं, केवल सामान्य मारपीट का आरोप लगाने से भी अपने आप कोई आपराधिक मामला नहीं बनता। इन्हीं आधारों पर अदालत ने धनबाद के एक शिकायत वाद में चल रही पूरी आपराधिक कार्रवाई और न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
इस मामले में हजारीबाग निवासी खालिद इकबाल की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में धनबाद के न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा 12 जून 2024 को शिकायत वाद में पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें अपहरण समेत अन्य धाराओं में प्रथम दृष्टया मामला मानते हुए समन जारी किया गया था।
पत्नी ने लगाए थे अपहरण के आरोप
शिकायतकर्ता पत्नी का आरोप था कि पति ने उसे चार वर्षीय बेटे के साथ धनबाद रेलवे स्टेशन बुलाया था। वहां से पति बच्चे को अपने साथ ले गया। इसके बाद जब वह पति के घर पहुंची तो पति और उसके परिजनों ने उसके साथ मारपीट की।
इन आरोपों के आधार पर न्यायिक दंडाधिकारी ने शिकायतकर्ता, उसके शपथ बयान और गवाहों के बयानों पर विचार करते हुए प्रथम दृष्टया मामला मानकर समन जारी किया था।
पिता के खिलाफ अपहरण का मामला नहीं बनता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कानून के अनुसार पिता अपने नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक होता है। इसलिए अपने ही बच्चे को अपने साथ ले जाने पर अपहरण का अपराध नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि अपहरण का मामला बनने के लिए बच्चे को उसके वैध संरक्षक की अनुमति के बिना उसकी अभिरक्षा से ले जाना जरूरी है। इस मामले में बच्चे को ले जाने वाला स्वयं उसका पिता है, इसलिए अपहरण के लिए जरूरी तत्व पूरे नहीं होते।
मारपीट के आरोप पर भी कोर्ट ने जताई आपत्ति
अदालत ने कहा कि शिकायत में सिर्फ मारपीट का आरोप लगाया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि शिकायतकर्ता को कोई शारीरिक चोट, दर्द, बीमारी या अन्य नुकसान हुआ। इसके अलावा किसी चिकित्सीय उपचार या चोट से जुड़े दस्तावेज का भी उल्लेख नहीं किया गया।
आपराधिक कार्यवाही जारी रखना बताया दुरुपयोग
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री की जांच के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी कोई अपराध नहीं बनता।
अदालत ने कहा कि ऐसे में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके बाद हाई कोर्ट ने धनबाद के शिकायत वाद की पूरी आपराधिक कार्यवाही और 12 जून 2024 को जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया।
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