अवैध रेत खनन पर एनजीटी सख्त, राज्यों को निगरानी के लिए नया ढांचा बनाने का निर्देश

HIGHLIGHTS
- एनजीटी ने अवैध रेत खनन रोकने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नियामक ढांचा तैयार करने के निर्देश दिए।
- कृषि भूमि से रेत हटाने की आड़ में होने वाले खनन की निगरानी के लिए सैटेलाइट तस्वीरों और एआई तकनीक के इस्तेमाल का सुझाव दिया गया।
- पर्यावरण मंत्रालय को इसरो के साथ मिलकर निगरानी व्यवस्था के विकल्प तलाशने और रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश मिला।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने अवैध रेत खनन के मामले में सख्त कदम उठाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। एनजीटी ने कहा है कि ऐसा व्यापक नियामक ढांचा तैयार किया जाए, जिससे मानसून के बाद निजी कृषि भूमि से रेत हटाने के नाम पर होने वाले अवैध व्यावसायिक खनन को रोका जा सके।
मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने रेत के जमाव और उसकी निकासी की निगरानी के लिए उपग्रह चित्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल का सुझाव दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हुई सुनवाई
17 जुलाई के आदेश, जिसे मंगलवार को सार्वजनिक किया गया, में एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में अधिकरण को उन सरकारी अधिसूचनाओं और नियमों की जांच करने का निर्देश दिया था, जिनके तहत कृषि भूमि से रेत हटाने की अनुमति दी जाती है।
पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने इन नियमों के दुरुपयोग से होने वाले ऊपरी उपजाऊ मिट्टी के नुकसान और अवैध खनन से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी।
राज्यों से विचार-विमर्श के बाद तैयार हुआ ढांचा
एनजीटी ने बताया कि प्रभावी निगरानी के लिए पहले भी कुछ निर्देश जारी किए गए थे। इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने मई 2026 में शपथपत्र दाखिल कर जानकारी दी कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चर्चा के बाद एक रूपरेखा तैयार की गई है।
पीठ ने कहा कि मंत्रालय के शपथपत्र के अनुसार, वर्ष 2026 में विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने माना था कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भौगोलिक और स्थलाकृतिक परिस्थितियां अलग-अलग होने के कारण एक समान व्यवस्था लागू करना संभव नहीं है।
विशेषज्ञ समिति ने दिए कई सुझाव
विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने प्राकृतिक भूमि संरचना को सुरक्षित रखने, प्राकृतिक सतह से नीचे खुदाई या खनन पर रोक लगाने, रेत के जमाव का आकलन करने, अवैध खनन रोकने के उपाय करने, वैज्ञानिक मूल्यांकन और निगरानी प्रणाली विकसित करने, रियल टाइम निगरानी लागू करने और रेत हटाने के लिए तय समय सीमा निर्धारित करने जैसे सुझाव दिए हैं।
एनजीटी ने कहा कि मानसून के बाद कृषि भूमि से रेत हटाने की प्रक्रिया को प्रभावी तरीके से नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि इसके नाम पर अवैध खनन न हो, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेषज्ञ समिति की तैयार रूपरेखा के आधार पर नियम बनाने होंगे।
अधिकरण ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मंत्रालय की रूपरेखा के अनुसार जरूरी नियम तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
एआई और सैटेलाइट से होगी निगरानी
एनजीटी ने कहा कि कृषि भूमि से रेत हटाने की आड़ में होने वाले अवैध खनन को रोकने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी साधनों का इस्तेमाल जरूरी है।
अधिकरण ने कहा कि मानसून से पहले और बाद के उपग्रह चित्रों का उचित सॉफ्टवेयर या एआई उपकरणों की मदद से विश्लेषण किया जा सकता है। इससे कृषि भूमि में रेत के जमाव का पता लगाने, रेत की अनुमानित मात्रा का आकलन करने और निकासी के बाद वास्तविक रूप से हटाई गई रेत की मात्रा का मिलान करने में मदद मिल सकती है।
इसरो के साथ विकल्प तलाशेगा पर्यावरण मंत्रालय
एनजीटी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ मिलकर इस संबंध में संभावनाएं तलाशने और रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अधिकरण ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मामले में पक्षकार बनाते हुए तैयार किए गए नियामक ढांचे के साथ जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
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