लखीमपुर खीरी में शारदा का कहर, 70 हेक्टेयर जमीन और कई मकान नदी में समाए

HIGHLIGHTS
- लखीमपुर खीरी के रूरा सुल्तानपुर में शारदा नदी के कटान से घर और खेत प्रभावित हुए हैं।
- सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, करीब 70 हेक्टेयर जमीन नदी में समा चुकी है।
- वीर बाबा का स्थान, माता जी का मंदिर और शिवलिंग नदी में समा चुके हैं।
लखीमपुर खीरी जिले में शारदा नदी का कटान ग्रामीणों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। नदी की तेज धार घरों और खेतों के साथ लोगों की जिंदगी भर की कमाई, पुरखों की निशानियों और पीढ़ियों से जुड़ी आस्था को भी बहा ले जा रही है। बिजुआ विकासखंड के रूरा सुल्तानपुर में कटान से हालात ऐसे हैं कि कई परिवारों के आशियाने उजड़ गए और खेती की जमीन नदी में समा गई। गांव के जिन मंदिरों में कभी घंटियां गूंजती थीं, वहां अब नदी की लहरें बह रही हैं। वीर बाबा का स्थान, माता जी का मंदिर और शिवलिंग पहले ही नदी में समा चुके हैं। अब काली माता का मंदिर भी कटान की चपेट में आ गया है। ग्रामीण अपनी आंखों के सामने घर, जमीन और पुरानी यादों को मिटते देखने को मजबूर हैं।
जिस आंगन में गूंजती थी हंसी, वहां अब बह रही नदी
रूरा सुल्तानपुर में शारदा का कटान केवल मकानों की दीवारें गिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ ग्रामीणों की वर्षों पुरानी यादें भी खत्म हो रही हैं। गांव के जगजीत सिंह बताते हैं कि जिस चौखट से उनके परिवार की बेटियां शादी के बाद विदा हुई थीं, वह अब नदी में समा चुकी है। जिस आंगन में परिवार के लोग एक साथ बैठकर सुख-दुख बांटते थे, वहां आज शारदा की धारा बह रही है।
जगजीत सिंह के मुताबिक, जिस जमीन पर उनके बुजुर्गों का अंतिम संस्कार हुआ था, वह भी नदी में समा चुकी है। उनके लिए यह केवल जमीन का नुकसान नहीं, बल्कि अपने पुरखों से जुड़ी आखिरी निशानियों को खोने का दर्द है।
अपने हाथों से आशियाने तोड़ने को मजबूर ग्रामीण
गांव के बेचू की कहानी भी दर्द से भरी है। वह बताते हैं कि मजदूरी करके पाई-पाई जोड़ने के बाद एक-एक ईंट लगाकर उन्होंने अपना घर बनाया था। इसी मकान में बच्चों को बड़ा होते देखा और परिवार के साथ पूरी जिंदगी बिताने के सपने संजोए थे। लेकिन अब नदी के कटान के कारण उसी घर को अपने हाथों से तोड़ना पड़ रहा है, ताकि मकान पूरी तरह नदी में समाने से पहले कुछ सामान बचाया जा सके।
बाढ़ में बह गईं बच्चों की किताबें और स्कूली बैग
बेचू बताते हैं कि घर तोड़ते समय हथौड़े की हर चोट सिर्फ दीवार पर नहीं पड़ती, बल्कि उनके दिल को भी चोट पहुंचाती है। जिस आशियाने को बनाने में पूरी जिंदगी की कमाई लगा दी, उसे खुद उजाड़ना पड़ रहा है।
बाढ़ के पानी में बच्चों के स्कूली बैग और किताबें तक बह गईं। घर छिनने के साथ बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। अब परिवार के सामने रहने के लिए सुरक्षित जगह तलाशने और दोबारा जिंदगी शुरू करने की चुनौती है।
शारदा नदी में समा गए मंदिर और शिवलिंग
रूरा सुल्तानपुर में नदी का कटान गांव के धार्मिक स्थलों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। गांव निवासी सुभाष अवस्थी बताते हैं कि वीर बाबा का स्थान काफी पुराना था। यहां अमावस्या के दिन मेला लगता था और दूर-दराज के गांवों से श्रद्धालु दर्शन करने आते थे। इस स्थान से लोगों की आस्था, मान्यताएं और पुरानी यादें जुड़ी थीं। समय के साथ श्रद्धालुओं ने यहां अपनी आस्था के अनुसार मंदिर बनवाए और शिवलिंग स्थापित कराए।
ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 2013 में भक्त सुखारी ने काली माता मंदिर का निर्माण कराया था। वहीं, सुखारी के भाई भूरगुन पुत्र रामऔतार ने वर्ष 1984 में उत्तर प्रदेश पुलिस में चयनित होने के बाद शिव मंदिर बनवाया था। भक्त बेचू ने अपनी मन्नत पूरी होने पर माता जी का मंदिर बनवाया था, जबकि कारण पाल सिंह ने मन्नत पूरी होने के बाद बड़ा शिवलिंग स्थापित कराया था।
अब वीर बाबा का स्थान, माता जी का मंदिर और शिवलिंग नदी में समा चुके हैं। काली माता का मंदिर भी कटान की भेंट चढ़ गया है। इन धार्मिक स्थलों के उजड़ने से ग्रामीणों को अपनी पीढ़ियों की आस्था और परंपराओं से जुड़े निशान मिटने का दुख है। जिन स्थानों पर कभी पूजा-पाठ होता था, वहां अब नदी की लहरें बह रही हैं। ग्रामीणों के लिए यह केवल मंदिरों का नुकसान नहीं, बल्कि गांव की पहचान और परिवारों की यादों से जुड़े स्थलों का बिछड़ना भी है।
खेत नदी में समाए, परिवारों की आजीविका पर संकट
शारदा नदी के कटान ने किसानों के सामने भी गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, रूरा सुल्तानपुर में करीब 70 हेक्टेयर जमीन नदी में समा चुकी है। जिन खेतों में पहले फसलें लहलहाती थीं, वहां अब पानी बह रहा है। जमीन के साथ किसानों की मेहनत, भविष्य की उम्मीदें और परिवार चलाने का सहारा भी खत्म हो गया है।
ग्रामीणों को अब एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ रहने के लिए सुरक्षित ठिकाना तलाशना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर रोजी-रोटी की चिंता सता रही है। जिस जमीन से परिवारों का खर्च चलता था, वह नदी में समा चुकी है। कटान की रफ्तार इतनी तेज रही कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। ग्रामीण घरों से बचा हुआ सामान समेटकर सुरक्षित स्थानों की तलाश में जुटे हैं। घर और खेत दोनों गंवाने के बाद अब उनके सामने भविष्य को लेकर चिंता बनी हुई है।
सरकारी आंकड़ों में 14 मकान उजड़े, ग्रामीणों का दावा 20 से अधिक
प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 12 पक्के और दो कच्चे मकान नदी में समा चुके हैं। अधिकारियों का कहना है कि कटान बढ़ने की स्थिति में छह अन्य मकानों को भी खतरा हो सकता है। दूसरी ओर, ग्रामीणों का दावा है कि मौके पर 20 से अधिक मकान कटान की भेंट चढ़ चुके हैं। इससे प्रशासन के आंकड़ों और ग्रामीणों के दावों में अंतर सामने आया है।
प्रशासन की ओर से कुछ प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिलने की बात कही जा रही है। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि जीवनभर की कमाई, घर और खेती की जमीन गंवाने के बाद मिलने वाली सहायता उनके नुकसान के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। उन्हें अब परिवार के रहने और आजीविका की व्यवस्था करने की चिंता सता रही है।
रूरा सुल्तानपुर में शारदा नदी का कटान लगातार ग्रामीणों की जिंदगी बदल रहा है। नदी की लहरें मिट्टी के साथ घर, खेत, मंदिर और पुरखों से जुड़ी यादें भी बहा ले जा रही हैं। जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब पानी बह रहा है। जिन मंदिरों में श्रद्धालु सिर झुकाते थे, वहां आस्था के निशान मिट चुके हैं। ग्रामीणों के सामने अब अपना जीवन फिर से बसाने की चुनौती है और हर गुजरते दिन के साथ उनका दर्द बढ़ता जा रहा है।
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