आसाराम की जमानत याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, वापस लेने की मिली अनुमति

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने गांधीनगर मामले में अंतरिम जमानत की याचिका वापस लेने की अनुमति दी।
- आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से 26 अक्टूबर तक पैरोल मिलने का उल्लेख अदालत ने किया।
- राजस्थान मामले में आसाराम की अपील 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को खुद को भगवान बताने वाले आसाराम की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में 2013 के गांधीनगर यौन शोषण मामले में बीमार पत्नी से मिलने के लिए जमानत देने से गुजरात हाईकोर्ट के इनकार को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 85 वर्षीय आसाराम के वकील को जमानत याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि जोधपुर में नाबालिग के यौन शोषण के मामले में आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से पहले ही 26 अक्टूबर तक पैरोल मिल चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाओं पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट आसाराम की दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। पहली याचिका गुजरात के मामले में अंतरिम जमानत से जुड़ी थी, जबकि दूसरी राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें जोधपुर में दर्ज मामले में उनकी सजा बरकरार रखी गई थी।
पीठ ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?
नाबालिग के यौन शोषण के मामले में सजा और उम्रकैद बरकरार रखने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आसाराम की अपील पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि उनके आत्मसमर्पण करने के बाद अदालत कानून से जुड़े एक अहम सवाल पर सुनवाई करेगी।
पीठ ने कहा कि उसने मामले में पेश सबूतों और रिकॉर्ड को देखा है, लेकिन अपील में फिलहाल ऐसा कुछ नजर नहीं आता।
जस्टिस पारदीवाला ने दवे से कहा कि जब तक वह अदालत को यह भरोसा नहीं दिलाते कि किसी चूक के कारण पूरी सजा गलत साबित हो सकती है, तब तक इस पर विचार नहीं किया जाएगा।
IPC की धारा 376 को लेकर आसाराम के वकील की दलील
सुनवाई के दौरान दवे ने दलील दी कि आसाराम को अन्य आरोपों में दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनके मुताबिक यह आरोप साबित नहीं हुआ था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि दोनों पक्षों के वकीलों ने बताया है कि दोषी याचिकाकर्ता पैरोल पर है और उसे 20 दिन की पैरोल दी गई है। अदालत ने मामले को 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही पीठ ने रजिस्ट्री को ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की डिजिटल और भौतिक प्रतियां मंगाने तथा उनका एक सेट याचिकाकर्ता, राज्य और पीड़िता को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या बताया?
राजस्थान और गुजरात की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि आसाराम को दोनों राज्यों में अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्होंने कहा कि आसाराम ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मेहता के मुताबिक, गांधीनगर की अदालत द्वारा एक अलग दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण आसाराम को रिहा नहीं किया जा सका। इसके बाद उन्होंने अंतरिम जमानत के लिए गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया।
उन्होंने बताया कि राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को पैरोल देने के आदेश का पालन करने का निर्देश दिया था। इसके बाद आसाराम ने फिर से राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया और अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मांग की। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
मेहता ने कहा कि इसी बीच आसाराम ने वैकल्पिक रणनीति के तहत अपनी पत्नी की खराब सेहत का हवाला देते हुए गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन उसे भी खारिज कर दिया गया। उन्होंने बताया कि फिलहाल आसाराम 20 दिन की पैरोल पर बाहर हैं।
पीड़ित पक्ष के वकील ने क्या कहा?
पीड़ित पक्ष के वकील ने बताया कि राजस्थान के मामले में अदालत की एक पीठ ने पहले एम्स से आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति पर रिपोर्ट मांगी थी। आसाराम ने मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की थी।
वकील के अनुसार, मेडिकल रिपोर्ट में सामने आया था कि आसाराम उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके बाद अदालत ने उन्हें दोबारा याचिका दाखिल करने की अनुमति इस शर्त पर दी थी कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने पर वह फिर से आवेदन कर सकते हैं।
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