कैबिनेट से मंजूरी: आईडीबीआई बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचेगी सरकार

HIGHLIGHTS
- फेयरफैक्स ने 81 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई।
- सौदे के बाद सरकार के पास 15% और एलआईसी के पास 19% हिस्सेदारी रहेगी।
- वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक ने 9,513 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया।
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बुधवार को एक बड़ा फैसला लिया गया। केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की आईडीबीआई बैंक में कुल 60.72 प्रतिशत रणनीतिक हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने इस विनिवेश प्रस्ताव को स्वीकृति दी।
इस सौदे के तहत कनाडाई वित्तीय समूह फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक कंपनी 'M/s 10955230 कनाडा इंक्वायरी' आईडीबीआई बैंक की नई रणनीतिक खरीदार बनेगी। इस सौदे का मूल्य 52,878.08 करोड़ रुपये बताया गया है। इसके पूरा होने पर यह भारतीय वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा निवेश माना जा रहा है।
आईडीबीआई बैंक सौदे में किसकी कितनी हिस्सेदारी बिकेगी?
रणनीतिक विनिवेश के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि एलआईसी की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री की जाएगी।
सौदा पूरा होने के बाद केंद्र सरकार के पास बैंक की 15 प्रतिशत और एलआईसी के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बनी रहेगी। इस तरह दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी 34 प्रतिशत होगी।
सरकार की शेष 15 प्रतिशत हिस्सेदारी को भविष्य में खुले बाजार के माध्यम से बेचने का अधिकार अधिकृत मंत्री समूह को सौंपा गया है।
दो चरणों में पूरी हुई बोली प्रक्रिया
आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री के लिए सरकार ने दो चरणों वाली पारदर्शी प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया अपनाई। इस प्रक्रिया की निगरानी अंतर-मंत्रालयी समूह और विनिवेश से जुड़े सचिवों के मुख्य समूह ने की।
वैधता और सुरक्षा जांच: बोली लगाने वालों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से 'फिट एंड प्रॉपर' जांच और गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य था।
प्रति शेयर मूल्यांकन: दो स्वतंत्र पेशेवर मूल्यांकन एजेंसियों ने बैंक के शेयर का औसत उचित मूल्य 75.99 रुपये प्रति शेयर आंका था।
फेयरफैक्स की सफल बोली: फेयरफैक्स ने 81 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई, जो स्वतंत्र एजेंसियों के मूल्यांकन से अधिक थी। इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 में शुरुआती बोलियां 94.42 रुपये प्रति शेयर के रिजर्व प्राइस से कम होने के कारण खारिज कर दी गई थीं।
घाटे और प्रतिबंधों से उबरकर बैंक ने बदली अपनी वित्तीय स्थिति
आईडीबीआई बैंक की स्थापना 1964 में एक विकास वित्तीय संस्थान के रूप में हुई थी। वर्ष 2004 में इसे वाणिज्यिक बैंक का दर्जा दिया गया। वर्ष 2010 से 2020 के बीच बैंक को वित्तीय संकट से उबारने के लिए सरकार ने करीब 25,000 करोड़ रुपये की पूंजी उपलब्ध कराई थी।
PCA प्रतिबंधों से बाहर आया बैंक: बढ़ते एनपीए और घाटे के चलते RBI ने मई 2017 में आईडीबीआई बैंक को प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) ढांचे में रखा था। सुधार के बाद मार्च 2021 में बैंक को इससे बाहर कर दिया गया।
एनपीए में कमी: बैंक का ग्रॉस एनपीए सितंबर 2018 में 31.78 प्रतिशत था, जो मार्च 2026 में घटकर 2.32 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में नेट एनपीए 17.30 प्रतिशत से कम होकर 0.15 प्रतिशत पर आ गया।
मुनाफे में सुधार: वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक ने 9,513 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। 30 सितंबर 2026 तक बैंक का कुल कारोबार सालाना आधार पर 18 प्रतिशत बढ़कर 6,27,149 करोड़ रुपये पहुंच गया।
सौदा पूरा करने के लिए आगे क्या होगा?
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। सफल बोलीदाता फेयरफैक्स को अब भारतीय रिजर्व बैंक के सामने अपनी साख साबित करनी होगी और केंद्रीय बैंक के नियामकीय नियमों के अनुपालन से जुड़ा रोडमैप प्रस्तुत करना होगा।
वहीं, एलआईसी अपनी बची हुई 19 प्रतिशत हिस्सेदारी का प्रबंधन अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं और नियामकीय दिशानिर्देशों के अनुसार करेगी।
भारतीय वित्तीय क्षेत्र पर क्या होगा असर?
आईडीबीआई बैंक का रणनीतिक विनिवेश सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के पुनर्गठन और निजी पूंजी को आकर्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। कभी भारी घाटे और एनपीए से जूझने वाले इस बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार के बाद अब इसकी बहुसंख्यक हिस्सेदारी निजी खरीदार को बेची जा रही है।
इस सौदे से बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और भारतीय वित्तीय बाजार में विदेशी निवेश के नए अवसर खुलने की संभावना जताई जा रही है।
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