दिल्ली हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रों के एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में ट्रांसफर या माइग्रेशन पर लागू पूर्ण प्रतिबंध को अमान्य करार दिया है। कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) को निर्देश दिया है कि वह माइग्रेशन की अनुमति देने के लिए सुसंगत और उचित नीति बनाए।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 का रेगुलेशन 18 “स्पष्ट रूप से अविवेकपूर्ण और मनमाना” है और यह संविधान के खिलाफ है। यह निर्णय 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई के दौरान लिया गया, जिसने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, बाड़मेर से दिल्ली के एक कॉलेज में माइग्रेशन की मांग की थी। अदालत ने एनएमसी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के ट्रांसफर आवेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाए।
अदालत की टिप्पणी:
कोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा संस्थानों में मानक और अखंडता बनाए रखने के नाम पर ट्रांसफर या माइग्रेशन पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं है। यह स्पष्ट रूप से अविवेकपूर्ण और मनमाना है। अदालत ने यह भी कहा कि माइग्रेशन के दुरुपयोग की आशंका को आधार बनाकर किसी छात्र के वैध अधिकारों को रोकना सही नहीं है।
अदालत ने ध्यान दिलाया कि बाड़मेर की कठोर जलवायु के कारण याचिकाकर्ता की स्वास्थ्य और क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (PwD Act) के तहत सार्वजनिक संस्थानों का दायित्व है कि दिव्यांग छात्रों को सुविधा और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाए।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास सिर्फ बाड़मेर के सरकारी कॉलेज की सीट लेने का विकल्प था, यह उसकी कम मेरिट के कारण नहीं बल्कि उसे काउंसलिंग के प्रारंभिक चरण में शामिल होने का अवसर न मिलने के कारण था। अदालत ने निर्णय में कहा, “युक्तिसंगतता समानता का एक पहलू है, और राज्य या उसकी संस्थाओं के हर निर्णय में यह होनी चाहिए।”
इस आधार पर, दिल्ली हाईकोर्ट ने ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 का रेगुलेशन 18 अवैध और अल्ट्रा वायर्स घोषित किया।