वाराणसी। सनातन परंपरा, वैदिक विरासत और शास्त्रीय ज्ञान की राजधानी काशी एक बार फिर नई पहल के जरिए पहचान बनाने जा रही है। प्रदेश में पहली बार संस्कृत आधारित गांवों की स्थापना की योजना बनाई गई है, जिसकी शुरुआत काशी क्षेत्र से होगी। पहले चरण में पांच गांवों को “संस्कृत गांव” के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके लिए संस्कृत भारती काशी प्रांत ने जमीनी स्तर पर सर्वे शुरू कर दिया है। इन गांवों के नामों की घोषणा 14 जनवरी के बाद की जाएगी।

संस्कृत भारती की ओर से बताया गया कि चयनित गांवों को एक वर्ष के लिए गोद लिया जाएगा और इस दौरान उन्हें संस्कृत भाषा आधारित जीवनशैली की ओर ले जाया जाएगा। 14 जनवरी को होने वाली बैठक के बाद पहले गांव के नाम की औपचारिक घोषणा की जाएगी। संस्था का उद्देश्य है कि संस्कृत केवल अध्ययन की भाषा न रहकर दैनिक जीवन का हिस्सा बने।

गांव चयन में उन बस्तियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां आबादी करीब एक हजार के आसपास हो। इससे सीमित जनसंख्या के बीच संस्कृत के प्रयोग को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। संस्कृत भारती काशी प्रांत के अध्यक्ष प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि काशी की सांस्कृतिक आत्मा संस्कृत से जुड़ी है, इसलिए यहां संस्कृत गांव की अवधारणा को व्यवहारिक रूप में उतारा जाएगा।

चयनित गांवों में रोजमर्रा के अभिवादन, सामान्य बातचीत, सूचना साझा करने और सामाजिक कार्यक्रमों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया जाएगा। गांवों के प्रवेश द्वार, गलियां, विद्यालय, पंचायत भवन और सार्वजनिक स्थल संस्कृत में लिखे सूचना पट्टों से सजाए जाएंगे। इसके साथ ही ग्रामीणों को सरल और संवादात्मक संस्कृत सिखाई जाएगी, ताकि भाषा सहज और उपयोगी बन सके। एक वर्ष तक संस्कृत भारती की टीम गांव में रहकर प्रशिक्षण देगी, जिससे संस्कृत बोलचाल की भाषा के रूप में विकसित हो सके।

शहर में भी दिखे संस्कृत की झलक

संस्कृत को शहरी पहचान देने की दिशा में भी तैयारी की जा रही है। वाराणसी के रेलवे स्टेशनों और लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर संस्कृत में घोषणाएं कराने की योजना है। स्टेशन, एयरपोर्ट और प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर नाम पट्ट और दिशा-सूचक बोर्ड भी संस्कृत में लगाए जाएंगे। व्यापारिक क्षेत्रों को इस अभियान से जोड़ते हुए दुकानदारों को अपनी दुकानों के नाम संस्कृत में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काशी को औपचारिक रूप से “संस्कृत नगरी” घोषित करने की मांग भी की जाएगी। इस प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर केंद्र सरकार को भेजने की तैयारी है।

संस्कृत को जन-जन से जोड़ने का लक्ष्य

प्रो. द्विवेदी के अनुसार संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि आज भी हर सनातनी परिवार में मंत्रों और परंपराओं के माध्यम से जीवित है। संस्कृत भारती का लक्ष्य है कि लोग अपनी मातृभाषा के साथ संस्कृत को भी पहचान दें। वर्तमान में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और उससे जुड़े महाविद्यालयों में करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं। संस्था का उद्देश्य अगले पांच वर्षों में कम से कम 50 करोड़ लोगों को किसी न किसी रूप में संस्कृत से जोड़ना है।

संतों और समाज के साथ मिलकर अभियान

संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिए काशी के संतों, व्यापारियों और सामाजिक संगठनों के साथ लगातार संवाद और बैठकें की जा रही हैं। 14 जनवरी के बाद काशी से इस जनआंदोलन की औपचारिक शुरुआत होगी। संस्कृत भारती वर्तमान में देश के सभी प्रांतों और विश्व के 18 देशों में संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।