मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट में दुकानों और आवासों को बचाने की मांग को लेकर चल रहा महिलाओं का धरना गुरुवार को लगातार 15वें दिन भी जारी रहा। धरना स्थल पर महिलाओं ने हनुमान चालीसा का पाठ कर विरोध दर्ज कराया। हालांकि उच्चाधिकारियों के साथ हुई बातचीत के बाद आंदोलन के तेवर पहले की तुलना में कुछ नरम पड़ते दिखाई दिए।
धरने पर बैठी महिलाओं का कहना है कि उनकी एकमात्र मांग अपने आशियाने और रोजगार की सुरक्षा है। वे सरकार से न्याय और राहत की उम्मीद लगाए बैठी हैं। वहीं शुक्रवार सुबह आवास विकास परिषद की सात टीमों ने सेंट्रल मार्केट पहुंचकर दुकानदारों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इस दौरान क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात रहा।
बुधवार को मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी, आवास एवं विकास परिषद के चेयरमैन पी. गुरु प्रसाद और आवास आयुक्त डॉ. बलकार सिंह के बीच व्यापारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इस दौरान अधिकारियों ने व्यापारियों से दस्तावेज लिए और उनकी समस्याएं सुनीं। बातचीत का असर गुरुवार को धरना स्थल पर भी देखने को मिला, जहां महिलाओं का रुख अपेक्षाकृत शांत रहा।
इससे पहले आंदोलनकारियों ने प्रतीकात्मक रूप से व्यापार की तेरहवीं और शोकसभा आयोजित करने की घोषणा की थी, लेकिन पुलिस ने मौके पर पहुंचकर इसे रोक दिया। धरने पर बैठीं शोभा, रजनी, अंजू, कांता, ममता और संतोष सहित अन्य महिलाओं का कहना है कि वे पिछले 35–40 वर्षों से इन मकानों में रहकर दुकानें चला रही हैं। उनका दावा है कि ये मकान LIG/EWS श्रेणी के हैं और किसी भी तरह की तोड़फोड़ से पूरी संरचना को खतरा हो सकता है।
व्यापारी नेता सतीश गर्ग के अनुसार, व्यापारियों ने सेटबैक से छूट और अन्य मांगों से जुड़े दस्तावेज अधिकारियों को सौंप दिए हैं। वहीं सांसद अरुण गोविल ने भी इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखने का आश्वासन दिया है, जिससे आंदोलनकारियों की उम्मीदें बढ़ी हैं।
उधर, सुप्रीम कोर्ट के 9 अप्रैल के आदेश के अनुसार अवैध निर्माण हटाने की प्रक्रिया के तहत दुकानदारों को नोटिस दिए जाने हैं। इसी क्रम में आवास विकास परिषद ने शुक्रवार सुबह सात टीमें लगाकर नोटिस वितरण शुरू कर दिया।
इस बीच बाजार के भीतर व्यापारियों के बीच मतभेद भी सामने आने लगे हैं। बताया जा रहा है कि कानूनी लड़ाई के लिए करीब 14 लाख रुपये का चंदा इकट्ठा किया गया है, जिसके उपयोग को लेकर विवाद बढ़ गया है। कुछ व्यापारियों ने अधिकारियों से मिलीभगत कर सूची से नाम हटाने के आरोप भी लगाए हैं। मामले की जांच की मांग भी उठाई गई है।