दारोगा नौशाद रिजवी पर यौन शोषण व मतांतरण के गंभीर आरोप, जमानत खारिज

जमुई | बरहट थाने में तैनात दारोगा मु. नौशाद रिजवी द्वारा फर्जी नाम और पहचान का इस्तेमाल कर महिलाओं को बहकाने और उनका शोषण करने के गंभीर मामले में अदालत ने कड़ा रूख अपनाया है। गुरुवार को अनुसूचित जाति की एक महिला से जुड़े पांच वर्ष पुराने यौन शोषण मामले की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायालय ने आरोपी दारोगा की जमानत याचिका खारिज करते हुए उसे जेल भेजने का आदेश दिया।
सूत्रों के अनुसार, नौशाद रिजवी खुद को पप्पू सिंह नाम से परिचय देकर माथे पर तिलक लगाता और राजपूत होने का दावा करता था। इसी झूठी पहचान के सहारे वह महिलाओं का विश्वास जीतकर उनका शारीरिक शोषण करता था। पीड़िता ने अदालत में बताया कि 2020 में एक केस की जांच के दौरान दारोगा ने वर्दी का दबदबा दिखाकर उसे अपने चंगुल में फंसा लिया। आरोप है कि उसने करीब तीन साल तक उसे बरहट और चंद्रमंडी थाने के क्वार्टरों में बंधक जैसा रखकर शोषण किया। विरोध करने पर वह उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें इंटरनेट मीडिया पर डालने की धमकी देता था।
पीड़िता के अनुसार, दारोगा की नजर जब उसकी 10 वर्षीय बेटी तक पहुंचने लगी, तब उसने हिम्मत जुटाकर शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन थाने से उसे वापस लौटा दिया गया। उसने तीन वर्षों में चार एसपी, डीआईजी और आईजी तक लिखित शिकायतें भेजीं और आरोपी द्वारा साझा की गई तस्वीरें भी पुलिस अधिकारियों को उपलब्ध कराईं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
निराश होकर पीड़िता ने 2024 में एससी-एसटी के विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया। कुछ अधिवक्ताओं और विशेष लोक अभियोजक मनोज दास ने बिना शुल्क उसके मामले की पैरवी की। जिला न्यायालय और हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद गुरुवार को दारोगा ने न्यायालय में आत्मसमर्पण किया और जमानत का अनुरोध रखा, जिसे विशेष न्यायाधीश सत्यनारायण शिवहरे ने अस्वीकार कर दिया। आदेश के बाद उसे तत्काल हिरासत में ले लिया गया। फिलहाल वह शेखपुरा में पदस्थापित था।
पीड़िता ने अदालत में यह भी खुलासा किया कि आरोपी कई अन्य लड़कियों को भी मतांतरण के लिए मजबूर कर चुका है। उसने चरकापत्थर समेत कई इलाकों की महिलाओं की तस्वीरें भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत कीं। सामाजिक और पुलिसिया दबाव के कारण अधिकांश महिलाएं सामने नहीं आ पाईं। शराबखोरी, हंगामा करने और दुर्व्यवहार की उसकी हरकतें पहले भी चर्चा में रही हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
अदालत परिसर के बाहर पीड़िता ने बताया कि मानसिक रूप से टूट चुकी वह कई बार आत्महत्या करने तक की सोचने लगी थी, लेकिन बच्चों के भविष्य ने उसे संभाले रखा। उसने कहा कि न्यायालय के फैसले ने उसे पहली बार राहत और भरोसा दिया है।
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