वह मेरा हमनाम था- गोविंद शर्मा वर्मा और शर्मा का ही भेद था, मुख्यनाम एक ही थाः गोविंद! कई महीनों से न भेंट हुई, न फोन पर बात ही हुई। 15 मार्च, 2026 को मैंने गोविंद शर्मा के नम्बर पर फोन कॉल लगाई। उधर से नारी स्वर गूंजा- हेलो! आज तक ऐसा नहीं हुआ था। जब कभी फोन मिलाया, गोविंद का स्वर सुनाई पड़ा- 'भाई साहब नमस्ते! सपने में भी नहीं सोचा था कि वह चुपचाप हमें छोड़ कर चला गया है।'
मैंने पूछा, आप कौन बोल रही हैं, शर्मा जी से बात करा दीजिए। उधर से जवाब आया- 'मैं शर्मा जी की पुत्रवधु निशा बोल रही हूँ। शर्मा जी से बात नहीं हो सकती क्योंकि वे रहे नहीं।' मेरे मुंह से अचानक निकला- 'क्या?' यह कब हुआ? दिल, दिमाग एकक्षण को चेतना-शून्य हो गया। सच्चाई को, खासकर कड़वी सच्चाई को स्वीकारना कितना कठिन होता है, यह प्रत्यक्ष रूप से जाना।
गोविंद शर्मा का चेहरा बार-बार आंखों के सामने आता रहा। दशकों साथ रहा। पत्रकारिताका जुनून उसके खून में था। शान्त और गम्भीर। खरा राष्ट्रवादी। इस मुद्दे पर किसी से कोई समझौता नहीं। कलम का सच्चा सिपाही था। जीवन पर रोज़ी रोटी के लिए संघर्ष किया किन्तु विचारों से समझौता नहीं किया। स्वाभिमान की जिन्दगी जिया। जिस देवबन्द में इस्लाम का विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केन्द्र है, जहां के मौलाना हर समय आग उगलते हैं, सदा गृह युद्ध की धमकियां देते रहते हैं, वहाँ उसने राष्ट्रवाद का परचम सदा ऊंचा रखा। अदम गोंडवी ने कहा था- 'बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को, भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।' अदम साहब जीवित होते तो उनसे कहता- आजाओ देवबन्द, तुम्हे दिखाता हूं यह शख्स कैसे भूखा प्यासा रह कर पत्रकारिता के उच्च आदर्श के लिए खूंखार लोगों से निहत्था लड़ रहा है, लेकिन घुटने नहीं टेक रहा।
गोविंद शर्मा सरल, मृदुभाषी था किन्तु मौका पड़ने पर उसमें भगवान परशुराम की आत्मा प्रविष्ट हो जाती थी। भारत पर मुस्लिम हमलावरों के कब्जे से पहले देवबन्द देववृन्द् या देवबन के नाम से जाना जाता था। गोविंद शर्मा ने प्राचीन नाम रखने की मुहिम चलाई। मां बालासुन्दरी मन्दिर से अतिक्रमण हटाने का आन्दोलन शुरू कराया। शारदीय नवरात्रों के अवसर पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कराने में योगदान दिया। एक कस्बाई पत्रकार इससे अधिक और क्या कर सकता है।
यहां मैं गोविंद शर्मा का संक्षिप्त जीवन परिचय और उनके द्वारा लिखा एक संक्षिप्त लेख प्रकाशित कर रहा हूं। यह उनके स्वर्गवास से पहले का मैटर है। इससे उनके जीवन पर थोड़ा सा प्रकाश पड़ेगा।
वक्फ बिल गरीब मुसलमानों के लिए वरदान: गोविंद शर्मा
देवबंद। वक्फ बिल लोकसभा में भारी बहुमत से पास हो गया है और राज्यसभा में भी पास हो जाएगा। अब बात उन नेताओं और राजनीतिक दलों की करते हैं जो लोकसभा में छाती पीट-पीटकर विधवा विलाप कर रहे थे और अब राज्यसभा में पुनः अपना रांडरोना रो रहे हैं।
देश में मुसलमानों का एक बड़ा गरीब तबका यह समझ चुका है कि वक्फ विधेयक उनकी भलाई के लिए है। विरोध करने वाले वक्फ कानून का नाजायज लाभ पा रहे थे, जो अब उन्हें नहीं मिलेगा। इन लोगों के कब्जे में करोड़ों की संपत्तियां हैं, जिनसे लाखों रुपये की आय हो रही है। हिंदुस्तान का कोई नगर या गांव ऐसा नहीं है, जहां इनकी संपत्ति न हो।
अभी बीस-पच्चीस साल से इन लोगों द्वारा सड़क किनारे, सड़कों के बीच चौड़े डिवाइडरों में कब्रें बनाकर हरी चादरें रातों-रात डाल दी जाती हैं। अफसोस की बात है कि हिंदू इसका कभी विरोध नहीं करता, क्योंकि वह सभी धर्मों का आदर करता है। यह देश में वक्फ की बड़ी चाल है।
पिछले बीस वर्षों में देश में पचास वर्षों की तुलना में कई गुना मस्जिदें और मदरसे बने हैं, यह भी एक योजना का हिस्सा बताया जा रहा है। इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि और म्यांमार तथा बांग्लादेशियों को भारत में घुसाकर जनसंख्या परिवर्तन कर देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का बड़ा षड्यंत्र बताया जा रहा है।
वक्फ बिल से विरोध करने वालों के कब्जे से बड़ी-बड़ी संपत्तियां—यहां तक कि कोठी, बंगले और आलीशान निजी गार्डन व मार्केट—छिनने की बात कही जा रही है। इसका लाभ किसी न किसी रूप में गरीब मुसलमानों को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
"कलम ही जिनकी पहचान थी"
ऐसा न झुकने वाले, न रुकने वाले, व्यवहार के धनी पत्रकार गोविंद शर्मा के बारे में कहा जाता था।
गोविंद शर्मा का जन्म एक मजदूर छोटे लाल के यहां हुआ था। उनका लालन-पालन उनकी माताजी सुमित्रा देवी के साथ-साथ उनकी बहन, शिक्षिका सत्यवती ने किया। इतना ही नहीं, इंटर, निबंध एवं पत्र लेखन में विशारद तक की शिक्षा भी उन्होंने दिलाने के साथ उनका विवाह भी कराया।
वर्ष 1968 में हाई स्कूल के बाद गोविंद शर्मा ने प्रदीप प्रिंटिंग प्रेस, देवबंद में नौकरी की। वर्ष 1980 में “भारत भारती प्रिंटर्स” नाम से अपना प्रेस स्थापित किया। उन्होंने वर्ष 1972 में विशारद करने के साथ दैनिक “आज”, बरेली में स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में कार्य प्रारंभ किया।
इसके बाद से वे लगातार 53 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं। वर्तमान में 74 वर्ष की आयु में वे मुजफ्फरनगर से प्रकाशित दैनिक “पश्चिमी प्रांत बुलेटिन” में कार्यरत थे।
गोविंद शर्मा ने इस दौरान दैनिक “बद्री विशाल” (सहारनपुर), “पंजाब केसरी” व “अजीत समाचार” (जालंधर), दैनिक “वीर अर्जुन” (नई दिल्ली), दैनिक “जागरण” (लुधियाना व देवबंद), दैनिक “इन दिनों” सहित दर्जनों पत्रों में संवाददाता के रूप में कार्य किया। इसके अलावा दैनिक “रॉयल बुलेटिन” और दैनिक “अभी तक” में उपसंपादक के रूप में भी कार्य किया।
गोविंद शर्मा निःस्वार्थ, निष्पक्ष और निडरता से लिखने वाले पत्रकार थे। निष्पक्ष लेखन के कारण वर्ष 1994 में उन पर हमला भी हुआ, जिसमें उन्हें काफी चोट आई थी।
अपनी ईमानदारी के कारण गोविंद शर्मा आज तक अपना एक छोटा सा घर भी नहीं बना सके। उनके एक पुत्र और दो पुत्रियां हैं, जो अपने-अपने परिवार के साथ रह रही हैं।
इसे बड़ा विद्रूप और विडम्बना कहा जाएगा कि सत्तालोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा लघु एवं ग्रामीण, अंचल के छोटे पत्रकारों के महत्व एवं योगदान की डींगें हाकती है किन्तु कस्बाई पत्रकारों की मदद नहीं करती। पक्ष या विपक्ष सभी बड़े मीडिया हाउसों के समक्ष बिछ जाते हैं। बड़े अखबारों के मालिकांन सत्ता पर आँखें भी तरेरते हैं और करोड़ों रूपया विज्ञापन राजस्व के रूप में हासिल कर लेते हैं। अपने कर्मचारियों, रिपोटर्स या संवाददाता को बंधुवा मजदूर की भांति रखते हैं।
मुजफ्फरनगर के चाहे ठाकुरदास चंचल हो, तुलसी नीलकंठ हों या इकरामुल हक नजम हों और अब देवबन्द के गोविंद शर्मा! सब की एक सी कहानी है। आंसुओं की चन्द बूंदों के अलावा हमारे पास देने को क्या है? जो दे सकते हैं वे निर्मम व निष्ठुर हैं। उनका दिल बड़ों को देख कर ही पसीजता है। जब तक जीवित हैं तब तक अपने साथियों को याद रखेंगे। गोविंद शर्मा को भी!
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'