वैश्विक मंच पर अमेरिका एक बार फिर सख्त तेवरों के साथ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्विट्ज़रलैंड पहुंच चुके हैं, जहां वे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में हिस्सा लेने के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं और उद्योग जगत के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। इसी दौरान अमेरिका ने चागोस द्वीप को लेकर हुए समझौते पर ब्रिटेन को खुली चेतावनी दी है और साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।
दावोस पहुंचते ही क्यों बढ़ी हलचल?
एयर फोर्स वन के ज्यूरिख में उतरते ही ट्रंप सीधे दावोस के लिए रवाना हुए। यहां वे पहले वैश्विक कंपनियों के प्रमुखों से बातचीत करेंगे और फिर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करेंगे। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब यूक्रेन युद्ध, वैश्विक आर्थिक सुस्ती और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों पर दुनिया की नजर अमेरिका की भूमिका पर टिकी हुई है।
किन मुद्दों पर बोलेगा अमेरिका?
दावोस में ट्रंप का भाषण मुख्य रूप से घरेलू आर्थिक हालात पर केंद्रित रहेगा। वे महंगाई, आम नागरिकों की घटती क्रयशक्ति और आवास संकट जैसे विषयों को प्रमुखता से उठा सकते हैं। इसके साथ ही ग्रीनलैंड से जुड़ी अमेरिकी रणनीति और वेनेजुएला में हालिया राजनीतिक हालात का भी जिक्र होने की संभावना है।
विदेशी नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों के जरिए अमेरिका अपने रुख को स्पष्ट करेगा।
टैरिफ की धमकी से बढ़ा यूरोप-अमेरिका तनाव
ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप ने डेनमार्क सहित कई यूरोपीय देशों को 10 से 25 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में गिरावट दर्ज की गई और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में खटास आ गई। यूरोपीय नेताओं ने भी जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए हैं, जिससे आर्थिक अनिश्चितता और गहराने की आशंका है।
आवास संकट और महंगाई पर जोर
ट्रंप दावोस में सस्ते घर और महंगाई कम करने की नीति पर भी बात करेंगे। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि टैरिफ बढ़ने से ब्याज दरों में उछाल आ सकता है, जिससे घर और महंगे हो सकते हैं। फिलहाल अमेरिका में मकानों की बिक्री तीन दशकों के निचले स्तर पर है, जो सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ का प्रस्ताव
ट्रंप इस मंच से एक नए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की रूपरेखा भी पेश कर सकते हैं, जो इस्राइल-हमास युद्धविराम की निगरानी करेगा। इसमें करीब 30 देशों के शामिल होने की उम्मीद है, हालांकि कई बड़े यूरोपीय देश अभी दूरी बनाए हुए हैं। ट्रंप का कहना है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र के प्रभाव को चुनौती दे सकती है।
चागोस द्वीप पर ब्रिटेन से क्यों नाराज है अमेरिका?
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा कि चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का ब्रिटेन का फैसला अमेरिका के लिए चिंता का विषय है। उनका कहना है कि डिएगो गार्सिया में स्थित संयुक्त अमेरिका-ब्रिटेन सैन्य अड्डा दोनों देशों की सामरिक सुरक्षा की रीढ़ रहा है और इस समझौते से रणनीतिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है।
ट्रंप प्रशासन का साफ संदेश
ट्रंप सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अपनी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सुरक्षा को किसी तीसरे पक्ष के भरोसे नहीं छोड़ेगा।
प्रशासन का मानना है कि डिएगो गार्सिया का सैन्य अड्डा दशकों से साझा सुरक्षा का अहम केंद्र रहा है और इसे किसी और के नियंत्रण में देना गंभीर रणनीतिक गलती होगी।
ब्रिटेन का पक्ष क्या है?
ब्रिटेन सरकार का कहना है कि कुछ अदालती फैसलों के बाद चागोस द्वीप पर उसका दावा कमजोर हो रहा था। इसी कारण मॉरीशस के साथ समझौता किया गया, ताकि सैन्य अड्डे की सुरक्षा बनी रहे। समझौते के तहत डिएगो गार्सिया का बेस 99 वर्षों के लिए लीज पर रहेगा, जिसे आगे 40 साल तक बढ़ाने का विकल्प भी होगा। लंदन का दावा है कि इससे अमेरिका-ब्रिटेन सैन्य सहयोग का भविष्य सुरक्षित रहेगा।