ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के बाद पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान इस समय एक जटिल कूटनीतिक समीकरण के केंद्र में हैं, जहां पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। पहले दौर की बातचीत करीब चार घंटे चली, जिसके बाद दूसरे चरण की वार्ता शुरू हो गई है।
सूत्रों के मुताबिक, इस बातचीत में सबसे बड़ा विवाद होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है, जहां दोनों देशों के बीच मतभेद गहरे बने हुए हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि जेडी वेंस और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस की भी खबर है।
इस बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयान ने हालात को और जटिल बना दिया है। उन्होंने साफ कहा कि इजराइल ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई और उसके सहयोगी समूहों के खिलाफ संघर्ष जारी रखेगा।
होर्मुज को लेकर टकराव जारी
वार्ता के दौरान ईरान और अमेरिका दोनों अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं। ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, जबकि अमेरिका इसे लेकर किसी बड़े समझौते के पक्ष में नहीं दिख रहा है। इसी कारण बातचीत में तनाव लगातार बना हुआ है।
पाकिस्तान की ओर से मेजबानी करते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस वार्ता को “मेक या ब्रेक” स्थिति बताया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि अगर समझौता नहीं होता है तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज को लेकर समाधान निकलने की संभावना है।
ईरान की शर्तें क्या हैं?
सूत्रों के अनुसार, ईरान ने वार्ता में कुछ प्रमुख शर्तें रखी हैं—
यूरेनियम संवर्धन पर रोक नहीं
क्षेत्रीय संघर्षों में इजरायली हमलों पर रोक
होर्मुज स्ट्रेट पर आर्थिक नियंत्रण और टोल व्यवस्था
विभिन्न देशों में फंसी ईरानी संपत्तियों को जारी करना
इन मुद्दों पर सहमति के बिना किसी बड़े समझौते की संभावना कम मानी जा रही है।
फ्रीज संपत्ति बना बड़ा मुद्दा
ईरान की सबसे बड़ी मांग उसकी विदेशों में फंसी संपत्तियों की वापसी है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, इराक, कतर, जापान और यूरोपीय देशों में ईरान के लगभग 100 से 120 अरब डॉलर तक के फंड फ्रीज हैं। यदि यह राशि जारी होती है, तो इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।
बढ़ता कूटनीतिक दबाव
अमेरिका और ईरान दोनों ही अपने-अपने रणनीतिक हितों पर कायम हैं। अमेरिका परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण चाहता है, जबकि ईरान आर्थिक और राजनीतिक रियायतों के बिना किसी समझौते के मूड में नहीं दिख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस वार्ता में कोई ठोस नतीजा निकलता है, तो यह पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन को बदल सकता है, लेकिन असफलता की स्थिति में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है।