बांग्लादेश में हिंसक आंदोलन के बाद सत्ता पर काबिज शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा है. वो पिछले 15 साल से पड़ोसी मुल्क की प्रधानमंत्री रहीं और आवामी लीग की मुखिया हैं. बांग्लादेश हिंसा की आग में जल रहा है. आरक्षण विरोधी आंदोलन से शुरू हुई हिंसा अंततः प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गया. फिलहाल शेख हसीना भारत पहुंचीं हैं और गाजियाबाद में हिंडन एयरबेस पर उनका विमान रुका हुआ है.

बांग्लादेश में सेना प्रमुख वाकर-उज-जमान ने शेख हसीना के इस्तीफे के बाद सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों और सेना के प्रमुख अधिकारियों की एक अंतरिम सरकार गठन करने का ऐलान किया है. आर्मी चीफ के अंतरिम सरकार के गठन के ऐलान के बाद भी बांग्लादेश में हिंसा नहीं थम रही है. प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री आवास में घुस गए और वहां तोड़फोड़ कर सामानों को लूट लिया.

4096 किलोमीटर सीमाएं भारत से लगती हैं

बांग्लादेश भारत का पड़ोसी राष्ट्र है. पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम सहित उत्तर पूर्वी राज्यों की लगभग 4096 किलोमीटर सीमाएं बांग्लादेश और भारत को जोड़ती हैं. ऐसे में बांग्लादेश में घट रही घटनाओं को भारत और बांग्लादेश से सटे राज्यों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है. विशेषकर बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की बोलचाल, भाषा, संस्कृति, खान पान और वेशभूषा सभी लगभग समान हैं.

साल 1947 में देश के स्वतंत्र होने के समय बंगाल विभाजन का दर्द अभी भी ऐपार बांग्ला (पश्चिम बंगाल) और ओपार बांग्ला (बांग्लादेश) के लोगों के जेहन में बसा हुआ है. बांग्लादेश में अभी भी पश्चिम बंगाल के लोगों के रिश्ते और रिश्तेदार हैं. ऐसे में पड़ोसी राष्ट्र के रूप में जल रहे बांग्लादेश को लेकर ही केवल भारत की चिंता नहीं है, बल्कि एक परिवार के बिखरने का दर्द भी पश्चिम बंगाल के लोगों में है. यही दर्द परेशानी और समस्याओं की वजह भी है.

इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों के कब्जे में बांग्लादेश

साल 1971 के बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुक्ति योद्धाओं का समर्थन किया और पाकिस्तान को पराजित कर बांग्लादेश का स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय हुआ. शेख मुजीबुर्रहमान देश के पहले राष्ट्रपति बने और भारत के योगदान को लेकर सदा ही एहसानमंद रहे. भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में इसका इम्पैक्ट भी दिखता रहा है, लेकिन बांग्लादेश की स्वतंत्रता के पांच दशक के बाद शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हसीना को अपना देश छोड़कर भागना पड़ा है.

बांग्लादेश में यह तख्तापलट का खेल मुक्ति योद्धा के परिवार के सदस्यों को शेख हसीना सरकार द्वारा नौकरियों में आरक्षण देने के ऐलान के बाद शुरू हुआ था. शुरू में यह आंदोलन छात्रों के हाथों में था, लेकिन अतं में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठनबांगलादेश छात्रशिबिरने आंदोलन को हाईजैक कर लिया. अब पूरा बांग्लादेश कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों के कब्जे में है.

शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति तोड़ने के मायने

छात्र आंदोलन के नाम पर हुए प्रदर्शन में करीब 300 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है. पुलिस और अवामी लीग के समर्थकों को निशाना बनाया गया. बांग्लादेश स्वतंत्रता के नायक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति नुकसान पहुंचाया गया. देश के संस्थापक की मूर्ति को तोड़ने का प्रयास किया गया. ढाका के शाहबाज चौराहे पर हिंसा का तांडव मचा. संसद भवन और प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा कर लिया गया. धानमंडी स्थित इंदिरा गांधी कल्चरल सेंटर में आग लगा दी गई. बांग्लादेश में हो रही हिंसा से और हिंसक प्रदर्शनकारियों की नियत और रवैये से साफ है कि यह आंदोलन उन लोगों के हाथों में है, जिन्हें न तो देश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान से कोई लगाव और न ही भारत से. इंदिरा गांधी कल्चरल सेंटर में आग लगाने की घटना इस ओर संकेत कर रही है.

वहां सेना ने सत्ता अपने हाथों में ले ली है और अंतरिम सरकार बनाने का ऐलान किया है. अवामी लीग की सरकार के रिश्ते भारत से बहुत ही मधुर रहे हैं. उस सरकार को भारत का मित्रवत सरकार माना जाता रहा है, लेकिन सेना प्रमुख वाकर-उज-जमान ने जिस अंतरिम सरकार के गठन करने की बात कही है इसमें शेख हसीना सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए गए इस्मालिक संगठन जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश छात्रशिबिर और बीएनपी जैसी पार्टियों के प्रतिनिधि भी शामिल रहेंगे. जिनका भारत के प्रति रवैया कभी भी मित्रवत नहीं रहा है और इसका प्रभाव भविष्य में दिखेगा भी.

अल्पसंख्यकों पर बढ़ेगा अत्याचार

बांग्लादेश मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार पार्थ मुखोपाध्याय बताते हैं कि अगले कुछ दिन बांग्लादेश के लिए काफी अहम है. यहां किस तरह की सरकार बनती है और भारत के प्रति उनका रवैया कैसा रहता है? सेना निश्चित रूप से एक कठपुतली सरकार चलाने की कोशिश करेगी. जिस तरह से बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथी संगठनों को प्रभाव रहेगा. उसका भारत और खासकर पश्चिम बंगाल पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक रहा है.

बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्मालिक ताकतों की बढ़ती शक्तियों के बाद वहां अल्पसंख्यकों खासकर हिंदू, बौद्ध और ईसाइयों पर अत्याचार बढ़ेंगे. फिलहाल बांग्लादेश में करीब 8 फीसदी अल्पसंख्यक हैं और भारत में अल्पसंख्यक एक ओर जहां कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए वोटबैंक हैं, वहीं बांग्लादेश में अल्पसंख्यक बहुसंख्यक समुदाय (मुस्लिमों) का दया पात्र है. बांग्लादेश में हिंसा और आवासी सरकार के तख्तापलट के बाद अल्पसंख्यक आबादी पर पहले से हो रहे अत्याचार और भी बढ़ेंगे.

शरणार्थी और घुसपैठियों की आएगी बाढ़

पश्चिम बांग्लादेश पुस्तक के लेखक और रिफ्यूजी मूवमेंट के नेता डॉ मोहित रॉय बताते हैं कि साल 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पश्चिम बंगाल में लगभग 1 करोड़ शरणार्थी आए थे. हालांकि उसमें काफी संख्या में वापस लौट गए थे, लेकिन उसके बाद भी भारत में शरणार्थी और घुसपैठियों का आना जाना जारी रहा. साल 1971 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी थी, जो साल 2011 की जनसंख्या के अनुसार बढ़कर 27 फीसदी हो गई है. पहले हर दस साल पर जनगणना होती थी, लेकिन साल 2021 में जनगणना नहीं हुई है, लेकिन अनुमान के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की आबादी करीब 34 फीसदी पहुंच गई है. पिछले 50 सालों में लगभग एक करोड़ घुसपैठिए भारत आए हैं.

उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल के कई सीमावर्ती जिलों मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मालदा, नदिया, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ी है. कई इलाके मुस्लिम बहुल हो गए हैं. कई इलाकों में मुस्लिमों की आबादी 70 फीसदी से अधिक है और हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं. इससे सीमावर्ती इलाके की डेमोग्राफी ही पूरी तरह से बदल गई है.

अब जब बांग्लादेश फिर से हिंसा की आग में जल रहा है. बड़ी संख्या में शरणार्थी और घुसपैठियों को भारत में प्रवेश करने की आशंका है. इसका सीमावर्ती इलाकों में बड़ा प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि केवल सीमावर्ती इलाके ही नहीं, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भी मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ रही है और इसका एक कारण बांग्लादेश से होने वाले घुसपैठ हैं.

रोहिंग्या और कट्टरपंथी संगठनों की बढ़ेगी ताकत

डॉ मोहित रॉय रोहिंग्या के भारत में प्रवेश को लेकर भी चिंता जताते हैं. उनका बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रोहिंग्या को शिविर में रखा गया है. इसके बावजूद भारत में रोहिंग्या को छिटपुट प्रवेश होता रहा है. केवल पश्चिम बंगाल और असम ही नहीं, दक्षिण भारत, महाराष्ट्र यहां तक कि दिल्ली से भी रोहिंग्या की गिरफ्तारी होती रही है. अब जब बांग्लादेश की सत्ता इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों में है, तो रोहिंग्या का आतंक बढ़ेगा और भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ के साथ-साथ रोहिंग्या के प्रवेश की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता है.

इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में जिस तरह से सत्तारूढ़ दल टीएमसी द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण दिया जाता है और उसे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इससे पश्चिम बंगाल में उनकी घुसपैठ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. इतना साफ है कि इससे पश्चिम बंगाल में कट्टरपंथी ताकतें बढ़ेगी. पश्चिम बंगाल पहले से ही इस्मालिक आतंकी संगठनों का अड्डा बनता रहा है और इस्लामिक संगठन सीमावर्ती इलाकों में मदरसों का इस्तेमाल आतंक फैलाने के हथियार के रूप में करते रहे हैं. ऐसे में बांग्लादेश में इस्लामिक ताकतों का बढ़ना और भी चिंता को बढ़ाता है.

चीन का बढ़ेगा प्रभाव, पूर्वोत्तर भारत में अशांति की आशंका

दूसरी ओर, शेख हसीना की सरकार के पतन, बीएनपी और इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती ताक भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे बांग्लादेश में चीन का प्रभाव बढ़ेगा, जिसकी चीन लंबे समय से कोशिश करता रहा है. इससे पहले जब बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार थी, तो बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके आतंकियों के गढ़ बन गए थे. असम में उल्फा जैसे उग्रवादी संगठनों को प्रश्रय दिया गया था. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की भी चिंता बढी है. सीमा पर बीएसएफ ने अपनी नजरदारी बढ़ा दी है. बांग्लादेश में तख्तापलट के दिन बीएसएफ के डीजी का कोलकाता पहुंचना और सुरक्षा की स्थिति पर जायजा लेना इस चिंता को जाहिर करता है.

कट्टरपंथी ताकतों के निशाने पर होगा भारत

बांग्लादेश में तख्तापलट के मद्देनजर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और लोगों से संयम बरतने की अपील की है. बांग्लादेश की पूरी घटना पर चिंता जताते हुए घोषणा की है कि इस मामले में भारत सरकार जो स्टैंड लेती है. पश्चिम बंगाल सरकार इसका पालन करेगी. बांग्लादेश में हिंसा के मद्देनजर पूर्व में ममता बनर्जी द्वारा राज्य के दरवाजे शरण मांगने वालों के लिए खोल देने के बयान के बाद अब वहां शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद दिया गया है बयान बहुत ही संयमित है और यह सराहनीय भी है.

पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं कि भारत सरकार ने शेख हसीना को शरण दी है, अस्थाई रूप से सही शेख हसीना को भारत में शरण देने से भारत बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों के निशाने पर होगा. अगले कुछ दिनों में यह देखना अहम होगा कि बांग्लादेश में गठित अंतरिम सरकार का भारत के प्रति रवैया कैसा रहता है और उसकी नीति क्या रहती है?