संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 39वें विशेष सत्र में भारत ने एक अप्रत्याशित रुख अपनाते हुए पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह को चौंका दिया। ईरान में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर लाए गए निंदा प्रस्ताव पर भारत ने खुलकर विरोध दर्ज कराया और उसके खिलाफ मतदान किया।
यह प्रस्ताव पश्चिमी देशों द्वारा पेश किया गया था, जिसमें ईरान की आंतरिक स्थिति, हालिया विरोध प्रदर्शनों और कथित मौतों को आधार बनाकर कड़ी आलोचना की गई थी। प्रस्ताव का उद्देश्य तेहरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना था।
कैसे हुआ मतदान?
47 सदस्यीय परिषद में इस प्रस्ताव पर मतदान कराया गया।
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25 देशों ने इसके समर्थन में वोट किया।
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14 देश तटस्थ रहे।
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जबकि 7 देशों ने इसके खिलाफ मतदान किया, जिनमें भारत, चीन और पाकिस्तान भी शामिल थे।
मतदान के दौरान सदन का माहौल बेहद गंभीर रहा और स्क्रीन पर दिखे नतीजों से वैश्विक मतभेद साफ नजर आए।
दुर्लभ संयोग: भारत, चीन और पाकिस्तान एक साथ
भारत आमतौर पर ऐसे संवेदनशील मामलों में तटस्थ रहने की नीति अपनाता रहा है, लेकिन इस बार उसने स्पष्ट रूप से विरोध का रास्ता चुना। भारत के साथ जिन देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, उनमें चीन, पाकिस्तान, इराक, वियतनाम, इंडोनेशिया और क्यूबा शामिल हैं। यह पहली बार था जब भारत, चीन और पाकिस्तान किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ही पक्ष में खड़े दिखाई दिए।
किन देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया?
इस प्रस्ताव के समर्थन में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, चिली, कोस्टा रिका सहित कई यूरोपीय और पश्चिमी देश शामिल रहे।
तटस्थ रहने वाले देश
ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, कतर, कुवैत, मलेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी और किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं किया।
भारत ने विरोध क्यों किया?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह रुख उसकी विदेश नीति में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। हाल के महीनों में अमेरिका के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ा है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दिखने लगा है।
इसके अलावा, ईरान भारत के लिए रणनीतिक और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से अहम देश रहा है। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं और तेल आपूर्ति के पुराने संबंध इस रिश्ते को मजबूत बनाते हैं।
भारत ने अपने वोट के जरिए यह भी स्पष्ट किया कि वह मानवाधिकारों के नाम पर किसी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का समर्थन नहीं करेगा और दोहरे मानदंडों के खिलाफ खड़ा रहेगा।
हालांकि, बहुमत मिलने के कारण यह प्रस्ताव परिषद में पारित हो गया, लेकिन भारत के रुख ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।