नई दिल्ली: 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर उसका क्रियान्वयन करने का रोडमैप वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को पेश किया। इसके साथ ही दक्षिणी राज्यों की यह चिंता कि केंद्र उनके राजस्व में कटौती कर सकता है, खत्म हो गई है। वहीं, अधिक आबादी वाले राज्यों को यह स्पष्ट संदेश गया है कि उन्हें आर्थिक सुधारों में तेजी लाकर राष्ट्रीय जीडीपी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।
केंद्रीय करों में राज्यों की कुल हिस्सेदारी 41 प्रतिशत पर बनी रहेगी, लेकिन आवंटन के नए फार्मूले में अब राज्यों के राष्ट्रीय जीडीपी योगदान को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि जिन राज्यों का आर्थिक योगदान अधिक है, उन्हें केंद्रीय करों में बढ़ी हुई हिस्सेदारी मिलेगी। नया फॉर्मूला अगले वित्त वर्ष से लागू होगा।
विशेष रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा और पंजाब को 15वें वित्त आयोग की तुलना में अब अधिक राशि मिलेगी। इसके उलट बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसी अधिक आबादी वाले राज्यों को मिलने वाले आवंटन में कमी आएगी।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि यह निर्णय पूर्व नीति आयोग उपाध्यक्ष अरविंद पनगढि़या की अध्यक्षता वाले आयोग की रिपोर्ट पर आधारित है, जो 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक लागू होगी। आयोग ने केंद्र और राज्यों के बीच वर्टिकल डिवोल्यूशन 41 प्रतिशत पर रखने की सिफारिश की, जबकि राज्यों के बीच हॉरिज़ॉंटल डिवोल्यूशन में बदलाव किए गए हैं।
नए फार्मूले में जनसंख्या, क्षेत्रफल, वन और पारिस्थितिकी, प्रति व्यक्ति आय अंतर, और राज्य की जीडीपी में योगदान जैसे पैरामीटर शामिल किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब राज्यों के जीडीपी योगदान को आवंटन में 10 प्रतिशत वेटेज दी गई है, जबकि क्षेत्रफल का वेटेज घटाकर 10 प्रतिशत किया गया है।
दक्षिणी राज्य—कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—15वें वित्त आयोग के बाद यह शिकायत करते रहे थे कि उनका योगदान राष्ट्रीय जीडीपी में अधिक होने के बावजूद, जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर मानव विकास सूचकांकों के कारण उनकी केंद्रीय कर हिस्सेदारी कम हो रही थी।
नए फॉर्मूले के अनुसार, कर्नाटक को अतिरिक्त 11,173 करोड़ रुपये, आंध्र प्रदेश को 6,975 करोड़ रुपये और केरल को भी अतिरिक्त राशि मिलने की संभावना है। गुजरात और हरियाणा को क्रमश: 4,228 करोड़ और 4,090 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिलेंगे।
वहीं, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार के आवंटन में कमी आएगी। सबसे अधिक कमी मध्य प्रदेश में 7,677 करोड़ रुपये की होगी। हालांकि, अधिक जनसंख्या और बड़े राज्यों का कुल हिस्सा अभी भी अधिक रहेगा, लेकिन इन राज्यों पर यह दबाव बढ़ जाएगा कि वे अपने विकास दर को तेज करें और राष्ट्रीय जीडीपी में अधिक योगदान सुनिश्चित करें।