पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली में चुनाव आयोग के कार्यालय से बाहर आते ही विवादित बयान देते हुए कहा कि वह इस पूरे मामले को लेकर गहरी चिंता में हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने विशेष रूप से बंगाल को निशाना बनाया है और लगभग 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, जबकि उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया।

ममता ने कहा, “मैं लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रही हूँ। चार बार मंत्री और सात बार सांसद रह चुकी हूँ। लेकिन मैंने आज तक ऐसा अहंकारी और झूठ बोलने वाला चुनाव आयुक्त नहीं देखा। मैंने उन्हें सम्मान देते हुए कहा कि किसी भी पद का स्थायित्व हमेशा नहीं रहता, एक दिन आपको भी जाना होगा।”

मुख्यमंत्री ने यह भी सवाल उठाया कि लोकतंत्र में चुनाव एक उत्सव की तरह होना चाहिए, लेकिन इस तरह की कार्रवाई से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बंगाल के साथ असमान व्यवहार क्यों किया जा रहा है।

ममता ने कहा कि चुनाव आयोग ने बिना उचित योजना के राज्यों में एसआईआर (विवरणात्मक मतदाता पंजीकरण) प्रक्रिया लागू की, जबकि इसे उन राज्यों में लागू किया जाना चाहिए था जिनमें चुनाव नहीं होने वाले थे। उन्होंने बताया, “अगर एसआईआर करनी ही थी तो पहले चुनाव से जुड़े राज्यों को छोड़कर इसे व्यवस्थित तरीके से लागू किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असम में भाजपा की सरकार होने के बावजूद वहां यह प्रक्रिया लागू नहीं की गई, जबकि बंगाल और तमिलनाडु में इसे थोप दिया गया, जिससे हमारे लिए गंभीर परिणाम सामने आए।”

सीएम ने आगे बताया कि 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और कई मिसमैपिंग की घटनाएँ हुई हैं। उन्होंने इसे आम लोगों के लिए असंभव और अन्यायपूर्ण प्रक्रिया करार दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री से भी सवाल किया कि क्या उनके माता-पिता के संस्थागत जन्म प्रमाणपत्र मौजूद हैं। ममता ने कहा, “मैं अडवाणी जी का सम्मान करती हूँ, लेकिन उनसे भी पूछना चाहती हूँ कि क्या वे अपने माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध करा सकते हैं।”

इस प्रक्रिया में हुई गंभीर गड़बड़ियों पर ममता ने चिंता जताई। उन्होंने बताया कि एसआईआर के दौरान 150 से अधिक लोग, जिनमें BLO भी शामिल हैं, अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने साथ लाए 100 लोगों में से कई को मतदाता सूची में मृत घोषित कर दिया गया था, जबकि वे जीवित हैं।

ममता बनर्जी ने इस पूरे मामले को लोकतंत्र और चुनाव की मूलभूत संप्रभुता के लिए गंभीर खतरे के रूप में बताया और चुनाव आयोग से तत्काल सुधार की मांग की।