ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भोजशाला मामले में आए हालिया फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय संविधान की मूल भावना और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
हैदराबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान ओवैसी ने आरोप लगाया कि अदालत ने ‘Places of Worship Act’ और ऐतिहासिक दस्तावेजों को नजरअंदाज किया है। उनका कहना था कि इस तरह के फैसले भविष्य में नए धार्मिक विवादों को जन्म दे सकते हैं।
ओवैसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मामले में ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा था, लेकिन भोजशाला मामले में उस सिद्धांत को दरकिनार किया गया है। उन्होंने टिप्पणी की, “आज आए फैसले ने इस कानून को कमजोर कर दिया है। अगर ऐसे ही निर्णय आते रहे तो कोई भी किसी भी धार्मिक स्थल पर दावा कर सकता है।”
उन्होंने भोजशाला मामले की तुलना बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद से करते हुए कहा कि दोनों मामलों में कानूनी स्थिति अलग थी। उनके अनुसार, बाबरी मामले में कब्जे का पहलू अलग था, जबकि भोजशाला में लंबे समय तक स्थिति भिन्न रही। ओवैसी ने कहा कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि बाबरी फैसले के बाद ऐसे कई विवाद सामने आ सकते हैं, लेकिन तब उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।
ओवैसी ने यह भी दावा किया कि अदालत ने 1935 के धार स्टेट गजट और 1985 के वक्फ पंजीकरण जैसे अहम दस्तावेजों को नजरअंदाज किया है। उन्होंने कहा कि यह मामला अभी भी सिविल कोर्ट में लंबित है, इसके बावजूद इस तरह का फैसला दिया गया।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। हाल ही में हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए परिसर को हिंदू पक्ष की ओर से मंदिर के रूप में मान्यता दी है। यह निर्णय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया, जिसमें कोर्ट ने रिपोर्ट पर भरोसा जताया।
इस विवाद की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने याचिका दायर की थी। इसके बाद 2024 में ASI सर्वे कराया गया, जिसकी रिपोर्ट बाद में अदालत में पेश की गई। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रखने के बाद अब अपना निर्णय सुनाया है।