कर्नाटक की राजनीति में हाल ही में मुख्यमंत्री पद को लेकर चली खींचतान के बावजूद, कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने अब एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वे कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नेता बन गए हैं। मंगलवार को उन्होंने अपने साथी मैसूर निवासी पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।

दो बार के मुख्यमंत्री उर्स का रिकॉर्ड बराबर
सिद्धारमैया ने अपने दूसरे कार्यकाल में अब तक 2,792 दिन मुख्यमंत्री के रूप में पूरे कर लिए हैं। इससे वे उर्स के रिकॉर्ड के बराबर पहुँच गए हैं। उनका पहला कार्यकाल 13 मई 2013 से 15 मई 2018 तक 1,829 दिनों का था, जबकि उनके वर्तमान कार्यकाल ने 20 मई 2023 से 963 दिन पूरे किए हैं। 7 जनवरी से उनका रिकॉर्ड और भी आगे बढ़ जाएगा।

पूर्व मुख्यमंत्री उर्स दो बार 1972-1977 और 1978-1980 तक मुख्यमंत्री रहे थे। वे सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों के प्रतीक माने जाते हैं। सिद्धारमैया उनके बाद पांच साल पूरे करने वाले एकमात्र मुख्यमंत्री बने।

राजनीतिक यात्रा: विरोध से कांग्रेस तक
1980 के दशक की शुरुआत से 2005 तक, गरीब किसान परिवार से आने वाले सिद्धारमैया कांग्रेस के कट्टर विरोधी रहे। जेडी(एस) से निष्कासित होने के बाद उन्होंने अंततः कांग्रेस में शामिल होकर अपने राजनीतिक करियर को नया मोड़ दिया। 2013 में उन्होंने कांग्रेस की ओर से पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला और बाद में नौ बार विधायक बने। 2023 में वे फिर से मुख्यमंत्री बने।

सिद्धारमैया का संघर्ष और उपलब्धियां
सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बाधाओं को पार किया। 2004 में वह मुख्यमंत्री बनने का मौका खो बैठे थे और 2005 में खुद को पिछड़े वर्गों के नेता के रूप में स्थापित किया। उन्होंने एचडी कुमारस्वामी और अन्य युवा नेताओं के उभरने के बावजूद अपनी स्थिति मजबूत रखी।

उन्होंने 16 बार राज्य का बजट पेश किया और भ्रष्टाचार, अवैध खनन और घोटालों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई। 2018 के चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन सिद्धारमैया अपने गृह क्षेत्र वरुणा से जीत हासिल कर फिर से सक्रिय हुए।

सिन्हा और भविष्य की राह
77 वर्षीय सिद्धारमैया ने राजनीति में लंबी यात्रा तय की है। वे अपने जीवन भर के राजनीतिक सपनों को साकार करने में सफल रहे हैं। हालांकि उन्होंने 2023 का चुनाव अपने अंतिम चुनाव होने का संकेत दिया था, लेकिन उन्होंने अब भी राजनीति में सक्रिय रहने के संकेत दिए हैं।

सिद्धारमैया की यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष का प्रमाण है, बल्कि कर्नाटक की राजनीति में कांग्रेस के भीतर उनकी मजबूत स्थिति और अनुभव को भी दर्शाती है।