मराठवाड़ा में सूखे का संकट, 80 फीसदी फसलें सूखने से किसानों की बढ़ी मुश्किलें

HIGHLIGHTS
- मराठवाड़ा में जून से सितंबर के बीच सामान्य से कम बारिश हुई।
- सामान्य 679.5 मिमी बारिश के मुकाबले 424.5 मिमी बारिश दर्ज हुई।
- लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित बताए गए हैं।
आसमान से मराठवाड़ा का इलाका भले ही हरा नजर आता हो, लेकिन जमीन पर पहुंचते ही हालात की अलग तस्वीर दिखाई देती है। खेतों में खड़ी सोयाबीन पीली पड़ चुकी है, कपास की पैदावार थम गई है, अरहर मुरझा गई है और गन्ना भी सामान्य ऊंचाई तक पहुंचने से पहले ही सूखने लगा है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में लातूर, बीड और धाराशिव के आसपास बारिश की कमी ने खरीफ की फसलों को प्रभावित किया है। करीब 80 फीसदी फसलें सूख चुकी हैं और किसान बड़े संकट का सामना कर रहे हैं।
इस फसल से खर्च निकालना मुश्किल, अगली फसल की चिंता
मराठवाड़ा में लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव सूखे से सबसे अधिक प्रभावित जिलों में हैं। जून से सितंबर के बीच इन क्षेत्रों में सामान्य बारिश 679.5 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 424.5 मिलीमीटर हुई। सूखे का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव पशुओं के चारे, ग्रामीण मजदूरी, परिवार की आमदनी और अगली फसल की बुआई के लिए जरूरी पूंजी पर भी दिखाई देने लगा है।
लातूर जिले के देवकरा गांव से एक किसान की आत्महत्या की घटना सामने आई है। दो एकड़ जमीन के काश्तकार तुकाराम गुट्टे ने आत्महत्या कर ली। कीनगांव से आगे जाने पर खेतों में खड़ी फसलों की जगह सूखे के हालात दिखाई देते हैं। सोयाबीन, कपास और अरहर की फसलें सूखती नजर आ रही हैं।
हिंगणगांव के किसान तुकाराम अंबाजी 40 एकड़ में खेती करते हैं। वे प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपये खर्च कर चुके हैं। उनका कहना है कि ऐसा लगता है कि अब फसल से खर्च भी नहीं निकल पाएगा।
डेढ़ लाख रुपये की फसल, हटाने में भी 40 हजार का खर्च
हगदल गांव के बालाजी मुंडे गन्ने के खेत की स्थिति बताते हैं। उनके मुताबिक, आमतौर पर गन्ना 20 से 25 फुट तक बढ़ता है, लेकिन इस बार 10 से 12 फुट की ऊंचाई पर ही रुक गया है और अब सूख रहा है। मुंडे का कहना है कि 2025 में ज्यादा बारिश ने परेशान किया था और इस साल बारिश की कमी ने संकट बढ़ा दिया है।
सावरगांव रोकड़े के राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार की खेती करते हैं। उन्होंने 8 एकड़ की फसल पर करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च किए हैं। अब खेत साफ करने के लिए भी उन्हें प्रति एकड़ 5 हजार रुपये खर्च करने होंगे। फसल में अगर कुछ बचता है तो उसका इस्तेमाल केवल मवेशियों के चारे के तौर पर किया जा सकता है।
नदी सूखी, जलाशयों में महज 12 फीसदी पानी
लातूर और बीड जिलों के तालाबों में भी पानी का स्तर काफी कम हो गया है। लातूर की जीवनवाहिनी मानी जाने वाली माजरा नदी भी सूखे की स्थिति से प्रभावित है। लातूर शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध का जलस्तर काफी नीचे पहुंच चुका है।
लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत स्टोरेज करीब 12.5 प्रतिशत रह गया है। नवाबकालीन साइ डैम भी इसी जल इतिहास का हिस्सा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल के मुताबिक, कभी साइ डैम के पानी से लातूर की प्यास बुझती थी, लेकिन अब यह इस्तेमाल में नहीं है। उनका कहना है कि जल रिसाव और पानी के प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो संकट की तीव्रता कम हो सकती थी।
खेती के सामने संकट के तीन चरण
लातूर और आसपास के किसानों से बातचीत में 1972 का साल बार-बार सामने आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं।
संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही दिखाई देने लगे थे। अब किसानों के सामने संकट तीन चरणों में नजर आ रहा है। पहले बुआई की समस्या रही, इसके बाद फसल बचाने की चुनौती आई और अब फसल हटाने के साथ अगली खेती के लिए पूंजी जुटाना किसानों के सामने नई परेशानी बन गया है।
सूखे से निपटने में 50 हजार करोड़ रुपये का खर्च
महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में राज्य के 265 तालुकों के बाद 43 और तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल किया गया है। इसके साथ ही फसल नुकसान के पंचनामे और पानी-चारे की व्यवस्था जैसे उपायों पर चर्चा हुई है।
अधिकारियों के मुताबिक, सूखे से निपटने में सरकारी खजाने पर 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। हालांकि, किसानों के लिए फसल नुकसान की भरपाई, पानी और चारे की व्यवस्था के साथ अगली फसल तक परिवार का खर्च चलाने के लिए आय के सहारे की भी जरूरत है।
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