फारूक अब्दुल्ला की चुनौती स्वीकार, नवंबर में लोकसभा और नेकां से इस्तीफा देंगे रुहुल्ला

HIGHLIGHTS
- रुहुल्ला ने तीन नवंबर को इस्तीफा देने का संकेत दिया
- अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व से असहमति जताते रहे हैं
- फारूक अब्दुल्ला ने उन्हें दोबारा जनता के बीच जाने की चुनौती दी थी
श्रीनगर। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के भीतर लंबे समय से चल रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला की चुनौती स्वीकार करते हुए नवंबर में लोकसभा और नेकां, दोनों से इस्तीफा देने की घोषणा की है।
रुहुल्ला ने तीन नवंबर को अपने पिता आगा सैयद मेहदी की बरसी पर इस्तीफा देने का संकेत दिया है। इससे स्पष्ट है कि उनका मतभेद अब केवल पार्टी की नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व के साथ भी टकराव की स्थिति बन गई है। उनके इस्तीफे के बाद श्रीनगर में होने वाला उपचुनाव रुहुल्ला और नेकां के बीच सीधे राजनीतिक मुकाबले में बदल सकता है।
रुहुल्ला लंबे समय से नेकां नेतृत्व की राजनीतिक दिशा पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका प्रमुख विरोध यह है कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के बाद पार्टी ने विशेष संवैधानिक दर्जे और अधिकारों की बहाली के मुद्दे पर अपने चुनावी रुख के मुताबिक पर्याप्त राजनीतिक संघर्ष नहीं किया।
उनका आरोप है कि सत्ता में आने के बाद नेकां का ध्यान अब मुख्य रूप से राज्य का दर्जा बहाल कराने तक सीमित हो गया है। उनके करीबियों के मुताबिक, रुहुल्ला अगले दो महीने कश्मीर में जनसंपर्क अभियान चलाएंगे। इस दौरान वह वादी के करीब-करीब हर शहर और गांव में जाकर लोगों को अपने एजेंडे और इस्तीफे के पीछे के कारणों से अवगत कराएंगे।
रुहुल्ला के लिए यह केवल राजनीतिक रणनीति का विषय नहीं है। वह लगातार कहते रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर से छीने गए संवैधानिक अधिकारों की बहाली संघर्ष का मूल उद्देश्य होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर वह कई बार पार्टी नेतृत्व से असहमति जता चुके हैं। उन्होंने नेतृत्व पर ‘समर्पण के रास्ते’ पर आगे बढ़ने का आरोप भी लगाया है।
फारूक ने दी थी जनाधार साबित करने की चुनौती
दोनों नेताओं के बीच मतभेद उस समय और बढ़ गए, जब फारूक अब्दुल्ला ने रुहुल्ला को लोकसभा से इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाने की चुनौती दी थी। फारूक ने कहा था कि अगर 2024 में श्रीनगर से मिली जीत रुहुल्ला के व्यक्तिगत जनाधार की वजह से हुई थी, तो उन्हें इस्तीफा देकर फिर से जनता का फैसला लेना चाहिए।
रुहुल्ला ने इस चुनौती से पीछे हटने के बजाय उसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने पहले ही संकेत दिया था कि फारूक अब्दुल्ला उनसे कुछ मांगेंगे तो वह उन्हें निराश नहीं करेंगे। अब नवंबर में इस्तीफे की घोषणा के साथ दोनों के बीच राजनीतिक टकराव निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।
श्रीनगर में होगा बड़ा शक्ति-परीक्षण
रुहुल्ला के इस्तीफे के बाद अगर श्रीनगर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होता है और वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबला सिर्फ सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। रुहुल्ला ने संकेत दिया है कि इस्तीफे के बाद वह निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं।
यह चुनाव यह भी तय करेगा कि श्रीनगर में वास्तविक राजनीतिक ताकत किसके पास है—रुहुल्ला के व्यक्तिगत जनाधार के पास या नेकां के संगठन और फारूक अब्दुल्ला की राजनीतिक विरासत के पास।
अगर रुहुल्ला जीतते हैं तो यह नेकां नेतृत्व के लिए बड़ा राजनीतिक झटका होगा। इससे यह संदेश जा सकता है कि पार्टी के पारंपरिक आधार में भी नेतृत्व की मौजूदा रणनीति को लेकर असंतोष है। वहीं, नेकां उम्मीदवार की जीत फारूक के इस दावे को मजबूत करेगी कि 2024 की जीत में पार्टी संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
सत्ता में वापसी के बाद भी नहीं थमा मतभेद
2024 में जम्मू-कश्मीर में नेकां की सत्ता में वापसी के बाद भी रुहुल्ला का असंतोष खत्म नहीं हुआ। वह लगातार सरकार और पार्टी नेतृत्व से जवाबदेही की मांग करते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि जनता से किए गए वादों और सत्ता में आने के बाद अपनाई गई राजनीति के बीच अंतर नहीं होना चाहिए।
अब उनका इस्तीफा नेकां के सामने दोहरी चुनौती लेकर आया है। एक तरफ पार्टी को अंदरूनी असंतोष से निपटना होगा, वहीं दूसरी ओर श्रीनगर में अपनी राजनीतिक पकड़ भी साबित करनी होगी।
आगे क्या करेंगे रुहुल्ला?
रुहुल्ला के अगले राजनीतिक कदम को लेकर चर्चाएं तेज हैं। उनके करीबियों के मुताबिक कांग्रेस या पीडीपी में जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, रुहुल्ला ने खुद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है।
उनके पिता आगा सैयद मेहदी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे थे। वर्ष 2000 में आतंकियों ने कनिहामा-मागाम में एक बारूदी सुरंग विस्फोट में उनके वाहन को उड़ा दिया था। इस घटना में आगा सैयद अपने तीन अंगरक्षकों और दो अन्य नागरिकों के साथ बलिदान हो गए थे।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि फारूक अब्दुल्ला की चुनौती के बाद नेकां के भीतर का मतभेद सार्वजनिक हो गया है। अब श्रीनगर का अगला चुनाव यह तय करेगा कि यह मुकाबला केवल एक असंतुष्ट सांसद का है या फिर बदलते राजनीतिक जनाधार का संकेत।
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