भारत में ही बनेंगे 94 राफेल लड़ाकू विमान, फ्रांस के साथ ₹3.25 लाख करोड़ की मेगा डील

HIGHLIGHTS
- भारत अब रक्षा क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है और सरकार की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
- अब फोकस केवल विदेशों से तैयार हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर ही उनके सह-विकास, सह-डिजाइन और सह-निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।
- फ्रांस के साथ चल रही राफेल लड़ाकू विमान से जुड़ी बातचीत में यह नई नीति साफ तौर पर झलकती है।
- ‘मेक इन इंडिया’ पर केंद्रित नई रक्षा नीति विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के रुख के अनुसार, भारत अब हर बड़े रक्षा सौदे में स्थानीय…
भारत अब रक्षा क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है और सरकार की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब फोकस केवल विदेशों से तैयार हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर ही उनके सह-विकास, सह-डिजाइन और सह-निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। फ्रांस के साथ चल रही राफेल लड़ाकू विमान से जुड़ी बातचीत में यह नई नीति साफ तौर पर झलकती है।
‘मेक इन इंडिया’ पर केंद्रित नई रक्षा नीति
विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के रुख के अनुसार, भारत अब हर बड़े रक्षा सौदे में स्थानीय उत्पादन और तकनीकी भागीदारी को प्राथमिकता दे रहा है। इसी रणनीति के तहत राफेल जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों के भविष्य के सहयोग मॉडल को नए ढांचे में ढाला जा रहा है।
फ्रांस दौरे के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा और तेज हुई, जहां विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने स्पष्ट किया कि भारत अब केवल खरीददार की भूमिका में नहीं रहना चाहता, बल्कि तकनीक और उत्पादन में साझेदार बनकर आगे बढ़ना चाहता है।
सह-निर्माण और स्थानीय उत्पादन पर जोर
भारत और फ्रांस के बीच हो रही बातचीत में सह-डिजाइन, सह-विकास और सह-निर्माण जैसे मॉडल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मौजूदा समय में भारतीय वायुसेना राफेल विमानों का उपयोग कर रही है और दोनों देशों के बीच इस बेड़े को और मजबूत करने पर लगातार बातचीत चल रही है।
भारत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी बड़े रक्षा सौदे में स्थानीय उद्योग की भागीदारी अधिकतम हो और देश के भीतर ही उत्पादन क्षमता विकसित हो।
3.25 लाख करोड़ की संभावित राफेल डील
सूत्रों के अनुसार, भारत ने फ्रांस को 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों के लिए औपचारिक अनुरोध पत्र भेजा है। यह सौदा लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है और इसे सरकार-से-सरकार (G2G) स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा।
इस प्रस्तावित समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 114 में से 94 विमान भारत में ही बनाए जाने की योजना है। इसके लिए फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन एक भारतीय साझेदार कंपनी के साथ मिलकर उत्पादन करेगी।
यह पहली बार होगा जब राफेल विमानों का निर्माण फ्रांस के बाहर किसी अन्य देश में किया जाएगा। इस परियोजना में 50 प्रतिशत तक स्थानीय सामग्री के उपयोग का लक्ष्य रखा गया है और भारत को अपने स्वदेशी हथियार और सिस्टम एकीकृत करने की भी पूरी स्वतंत्रता मिलेगी।
वायुसेना की जरूरत और बढ़ता बेड़ा
भारतीय वायुसेना इस समय लड़ाकू विमानों की कमी का सामना कर रही है, जिससे स्क्वाड्रन क्षमता प्रभावित हो रही है। ऐसे में राफेल जैसे आधुनिक और 4.5 पीढ़ी के विमान बेहद अहम भूमिका निभाते हैं।
भारत पहले ही वायुसेना और नौसेना के लिए कुल 62 राफेल विमान खरीद चुका है। अगर प्रस्तावित 114 विमान शामिल होते हैं, तो देश में राफेल की कुल संख्या 176 तक पहुंच जाएगी।
नौसेना भी समुद्री सुरक्षा जरूरतों के लिए अतिरिक्त 31 राफेल विमानों की मांग कर चुकी है। यदि ये भी बेड़े में शामिल होते हैं, तो भारत में राफेल विमानों की कुल संख्या 200 से अधिक हो सकती है।
आगे की प्रक्रिया
रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, फ्रांस की ओर से इस प्रस्ताव पर अगले कुछ महीनों में जवाब आने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ने पर अगले एक साल में समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है। इसके बाद भारत में राफेल उत्पादन की प्रक्रिया शुरू होने में लगभग साढ़े तीन साल का समय लग सकता है।
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