जयपुर सीरियल ब्लास्ट केस: सुप्रीम कोर्ट ने दो दोषियों की रिहाई की याचिका खारिज की

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सामान्य जमानत की तरह नहीं मानने की बात कही
- नौवें बम को बम निरोधक दस्ते ने समय रहते निष्प्रभावी कर दिया था
- राजस्थान हाईकोर्ट के बरी करने के फैसलों के खिलाफ राज्य की अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 के जयपुर सिलसिलेवार बम धमाका मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी मोहम्मद सरवर आजमी उर्फ ढिल्ला पप्पू और शाहबाज अहमद की रिहाई की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह बेहद गंभीर मामला है और इसे सामान्य जमानत याचिका की तरह नहीं देखा जा सकता। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसुरक्षा से जुड़ा गंभीर खतरा शामिल है।
न्यायाधीश एमएम सुंदरेश और न्यायाधीश प्रसन्ना वी वराले की पीठ ने दोनों दोषियों की अपील को खारिज करते हुए यह आदेश दिया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया गया, जिसमें अपील लंबित रहने के दौरान दोनों की रिहाई से मना किया गया था।
13 मई 2008 को हुआ था सिलसिलेवार धमाका
यह मामला 13 मई 2008 को चांदपोल बाजार में मिले एक जिंदा बम से जुड़ा है। उस शाम गुलाबी नगर में नौ अलग-अलग स्थानों पर बम रखे गए थे। इनमें से आठ बमों में एक के बाद एक धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 70 निर्दोष लोगों की मौत हुई थी, जबकि 186 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि इसी आपराधिक साजिश से जुड़े आठ अन्य मामलों में राजस्थान उच्च न्यायालय आजमी को पहले ही बरी कर चुका है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जब आठ मामलों में उसे निर्दोष माना जा चुका है, तो नौवें मामले में उसकी हिरासत जारी रखना उचित नहीं है।
बचाव पक्ष ने पुलिस कार्रवाई में हुई 12 साल की देरी पर भी सवाल उठाया। वकील ने कहा कि आरोपी पहले ही 15 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने बताया कि नौवें बम से जुड़ा मामला साक्ष्यों और बरामद किए गए जिंदा बम के कारण बाकी आठ मामलों से अलग है।
सरकार की ओर से कहा गया कि एक दुकानदार ने आजमी की पहचान उस व्यक्ति के तौर पर की है, जिसने बम ले जाने के लिए इस्तेमाल की गई साइकिल बेची थी।
राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के बरी करने के फैसलों के खिलाफ राज्य की अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। ऐसे में उन फैसलों का लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता। सरकार ने कहा कि गिरफ्तारी में हुई देरी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मामला झूठा है।
नौवां बम नहीं फटा, टली बड़ी तबाही
चांदपोल में सीतारामजी मंदिर के सामने रखा गया नौवां बम बम निरोधक दस्ते के सदस्य सुनील भाटिया और उनकी टीम ने सूझबूझ से निष्प्रभावी कर दिया था। इससे बड़ी तबाही टल गई थी। यदि वह बम फट जाता तो कम से कम 20 से 25 और बेगुनाह लोगों की जान जा सकती थी।
वर्ष 2025 में विशेष अदालत ने नौवां बम लगाने की साजिश में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देने वाली उच्च न्यायालय की याचिका खारिज होने के बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना है।
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