सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाई कोर्ट से वापस ली याचिका, एसईएम की सुनवाई के बाद लेंगे फैसला

HIGHLIGHTS
- दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले एसईएम के सामने अपना पक्ष रखने की सलाह दी।
- सुनवाई के दौरान अदालत ने न्यायिक हिरासत और निवारक हिरासत के बीच अंतर स्पष्ट किया।
- याचिकाकर्ताओं के वकील ने हिरासत की अवधि और जमानत प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाने के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। बुधवार को अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दोनों नेताओं को पहले एसईएम के समक्ष होने वाली सुनवाई में अपना पक्ष रखने की सलाह दी। इसके बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई अहम टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि जब मामले की सुनवाई उसी दिन एसईएम के सामने होनी है, तो पहले वहां की कार्यवाही का इंतजार करना बेहतर होगा। अदालत ने सुझाव दिया कि अगर वहां से राहत नहीं मिलती है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
अदालत में क्या-क्या हुआ?
सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमिनी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 14 अक्टूबर को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा था, लेकिन हिरासत की प्रक्रिया और उसे लागू करने का तरीका अलग मुद्दे हैं।
इस पर न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि यह दोनों की ओर से शांति भंग करने की दूसरी घटना है और उन्होंने पहले दिए गए बॉन्ड का उल्लंघन किया है। अदालत ने सवाल किया कि जब एसईएम के समक्ष उसी दिन सुनवाई होनी है, तो हाई कोर्ट में तत्काल आने की जरूरत क्या थी।
पीठ ने कहा कि अगर आदेश पर पुनर्विचार हो सकता है, तो पहले एसईएम के सामने दोपहर दो बजे होने वाली सुनवाई में अपना पक्ष रखा जाना चाहिए। इसके बाद ही कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी पूछा कि जब दूसरी बार शांति भंग होने की स्थिति सामने आई है, तो क्या अधिकारियों को सख्ती बरतने का अधिकार नहीं है। पीठ ने वकील से कहा कि फिलहाल बहस करने के बजाय अपनी दलीलें रिवीजन कोर्ट और जरूरत पड़ने पर हाई कोर्ट के लिए सुरक्षित रखनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि यदि शाम तक मामला उनके पक्ष में सुलझ जाता है, तो आगे की कानूनी कार्यवाही की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन राहत नहीं मिलने पर वे संबंधित अदालतों का रुख कर सकते हैं।
'बहस तभी होनी चाहिए, जब जरूरी हो'
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अभिक चिमिनी ने कहा कि संबंधित आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। इस पर अदालत ने कहा कि बहस तभी होनी चाहिए, जब उसकी आवश्यकता हो। केवल लोगों को सुनाने के लिए बहस करने की जरूरत नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि बहस करने के कुछ ऐसे परिणाम हो सकते हैं, जिन्हें बाद में बदला नहीं जा सकेगा।
जब वकील ने जमानत से जुड़े निष्कर्षों का उल्लेख किया, तो अदालत ने उनसे दोनों नेताओं की उम्र पूछी। चिमिनी ने बताया कि सौरव दास 27 वर्ष और आशुतोष रांका 32 वर्ष के हैं। इस पर पीठ ने कहा कि वे जेन-जी नहीं हैं। अदालत को बताया गया कि वर्ष 1997 के बाद जन्मे लोगों को जेन-जी कहा जाता है।
'संगठन वही है, लेकिन मकसद बदल गया है'
अदालत ने सीजेपी के संगठन और उसके उद्देश्य को लेकर भी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि शुरुआत में यह छात्रों का विरोध प्रदर्शन था, जिसमें बच्चे भी शामिल थे, लेकिन अब इसका उद्देश्य कुछ और नजर आ रहा है। अदालत के अनुसार, लोग वही हैं, लेकिन मकसद बदल रहा है।
पीठ ने कहा कि जब शांति और व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि संबंधित लोग कौन हैं, उनका संगठन क्या है और उसका उद्देश्य क्या है। अदालत ने जुलाई में हुए पहले विरोध प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भी संगठन वही था, लेकिन उसके उद्देश्य में बदलाव दिखाई दिया।
हिरासत और जमानत पर वकील ने रखी दलील
अधिवक्ता अभिक चिमिनी ने अदालत के सामने दो मांगें रखीं। उन्होंने कहा कि जमानत को खारिज करना कानूनी रूप से गलत है और उनके मुवक्किलों को निजी मुचलके पर रिहा किया जाना चाहिए।
इस पर अदालत ने पूछा कि उस दिन ट्रायल कोर्ट में सुनवाई का उद्देश्य क्या है। चिमिनी ने जवाब दिया कि उनकी न्यायिक हिरासत की अवधि समाप्त हो रही है और इसी वजह से उन्हें अदालत में पेश किया जाना है।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि सौरव दास और आशुतोष रांका को बुधवार को पेश किया जाना है और उन्हें नई जमानत देने का निर्देश दिया गया है।
पीठ ने वकील से पूछा कि क्या वे आज नई जमानत दे रहे हैं। चिमिनी ने कहा कि वह कई बार जमानत दे चुके हैं। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या जमानत खारिज करने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है। वकील ने जवाब दिया कि उनके अनुसार ऐसा किया जा सकता है।
चिमिनी ने दलील दी कि 19 अक्टूबर का आदेश गलत है, क्योंकि एसईएम के पास उनकी हिरासत बढ़ाने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि एहतियाती हिरासत की व्यवस्था मनमाने तरीके से लागू की जा रही है।
इस पर अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यदि कानून में कोई उपाय उपलब्ध है, तो उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी हुई चर्चा
अदालत ने वकील से पूछा कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दायर की है। चिमिनी ने आशंका जताई कि यदि वह आदेश के खिलाफ अपील करते हैं, तो एसईएम के सामने दोपहर दो बजे होने वाली सुनवाई में उनकी जमानत किसी नए आधार पर खारिज की जा सकती है।
इस पर पीठ ने कहा कि यदि मामला एहतियाती निरोध का है, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का विकल्प उपलब्ध हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रिवेंटिव कस्टडी और प्रिवेंटिव डिटेंशन के बीच अंतर होता है।
चिमिनी ने कहा कि 19 अक्टूबर के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसी कौन-सी सामग्री मिली थी, जिसके आधार पर भविष्य में किसी आसन्न खतरे की आशंका जताई गई।
इस पर अदालत ने कहा कि सवाल मजिस्ट्रेट की संतुष्टि का है और हाई कोर्ट मजिस्ट्रेट की जगह खुद को रखकर अलग निष्कर्ष कैसे निकाल सकता है।
पीठ ने अपील और रिट याचिका के बीच अंतर भी समझाया। अदालत के अनुसार, अपीलीय अदालत तथ्यों और उनके आकलन पर विचार करके निष्कर्ष निकालती है, जबकि रिट याचिका में निर्णय लेने की प्रक्रिया की समीक्षा की जाती है, न कि सीधे फैसले की।
वकीलों ने की थी तत्काल सुनवाई की मांग
सौरव दास और आशुतोष रांका के वकीलों ने मंगलवार को मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी। इसकी वजह दशहरा के कारण पूरे सप्ताह हाई कोर्ट में अवकाश होना बताया गया था।
सोमवार को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने दोनों नेताओं की हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें लगातार हिरासत में रखना उनके मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। उनका कहना था कि एसईएम ने यह कहते हुए हिरासत बढ़ाई कि उन्होंने जरूरी बॉन्ड जमा नहीं किया, जबकि उनके अनुसार कानून के मुताबिक जमानतदार पेश किए जा चुके थे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र रूप से जांच किए बिना केवल पुलिस की अर्जी के आधार पर आदेश दिया। याचिका में कहा गया कि हिरासत में रखने की आवश्यकता का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।
दोनों नेताओं ने यह दलील भी दी कि प्रतिबंधित स्थान पर विरोध प्रदर्शन करना सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा होने के बजाय अधिकतम नियमों के उल्लंघन का मामला हो सकता है।
13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के बाद हुई थी गिरफ्तारी
दिल्ली पुलिस ने 13 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया था। इसके बाद एसईएम अदालत ने 15 अक्टूबर को दोनों को पहले पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था। सोमवार को उनकी हिरासत दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई थी।
अदालत ने पहले कहा था कि दोनों नेताओं का व्यवहार दर्शाता है कि वे कानून का सम्मान नहीं करते और शांति एवं व्यवस्था भंग कर सकते हैं।
बुधवार को हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत के सुझाव के बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली। अधिवक्ता अभिक चिमिनी ने कहा कि एसईएम के समक्ष सुनवाई के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा। अदालत ने याचिका वापस लेने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
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