छात्र प्रदर्शन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस कार्रवाई और एफआईआर पर मांगा जवाब

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन हिंसा मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई की।
- अदालत में पुलिस के कथित अत्यधिक बल प्रयोग और पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए।
- कोर्ट ने कहा कि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को अलग चिन्हित किया जाए।
- याचिकाकर्ताओं ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और एसआईटी गठन की मांग की।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई की। इनमें से एक समूह की याचिकाओं में प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर जरूरत से अधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
किन मामलों से जुड़ी हैं याचिकाएं?
कुछ याचिकाएं उन सरकारी अधिकारियों की ओर से भी दायर की गई हैं, जिन्हें प्रदर्शन के दौरान कथित रूप से चोटें आई थीं। वहीं, एक अन्य याचिका प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर दाखिल की गई है। इन सभी मामलों की सुनवाई चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि पिछले आदेश के अनुसार अब तक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया है।
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर आगे की कार्रवाई के संबंध में कुछ गलतफहमी या संवाद की कमी रही थी। उन्होंने कहा कि सरकार इस संबंध में दिए गए अपने आश्वासन को पूरा करने के लिए गंभीर है।
तुषार मेहता ने यह भी बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर से चर्चा की है और अब यह तय किया जाएगा कि आगे किस प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाए।
एफआईआर पर क्या बोलीं वृंदा ग्रोवर?
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि दर्ज एफआईआर वापस ली जाएंगी या उन्हें रद्द किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मामला शिक्षा व्यवस्था में सुधार से जुड़ा था और इसमें शामिल छात्र-छात्राओं का पूरा भविष्य उनके सामने है।
उन्होंने बताया कि बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से जुड़े मामलों में भी एफआईआर रद्द कराने की मांग की गई है। राज्यों के साथ बातचीत पूरी होने के बाद दोबारा अदालत का रुख किया जाएगा।
इस पर तुषार मेहता ने कहा कि कानून के तहत जो भी संभव होगा, सरकार उसी के अनुरूप अपनी प्रतिबद्धता निभाएगी।
'आपराधिक रिकॉर्ड' वालों को अलग करने की बात
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सबसे पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि कुल कितनी एफआईआर दर्ज हुई हैं। इसके बाद उन लोगों की पहचान अलग की जाए, जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।
सरकार का पक्ष
तुषार मेहता ने कहा कि कानूनी रूप से एफआईआर वापस लेना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस मामले को लगातार गर्म रखना चाहते हैं, इसलिए सरकार को कानूनी सलाह लेने में सावधानी बरतनी होगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि अलग-अलग लोक अभियोजकों के जरिए मामलों को बंद कराने की प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित होती है।
मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार का जवाब तैयार है, लेकिन दाखिल करने से पहले वह स्वयं उसे पढ़कर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उसमें कोई कमी न हो।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग
गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि सरकार के जवाब में कई अहम सवालों के उत्तर दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन पुलिस अधिकारियों ने कार्रवाई की थी, उनकी पहचान की जा चुकी है।
उन्होंने मांग की कि हलफनामे में यह स्पष्ट किया जाए कि रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) को निर्देश देने की जिम्मेदारी किसकी थी। साथ ही पुलिस आयुक्त और आरएएफ के निदेशक से यह भी पूछा जाए कि पैलेट गन और लाठीचार्ज की अनुमति किस आधार पर दी गई।
उन्होंने कहा कि पुलिस को इस तरह कार्रवाई करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत के समक्ष वीडियो भी पेश किए गए हैं और इस गंभीर मामले में जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या कहा?
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जब सॉलिसिटर जनरल इस मुद्दे पर विचार करने की बात कर रहे हैं, तो पहले अदालत के पिछले आदेश को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ये छात्र हैं और 'आपराधिक रिकॉर्ड' शब्द का दायरा बहुत व्यापक है। किसी के खिलाफ ड्राइविंग उल्लंघन, मामूली अपराध या राजनीतिक विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले भी दर्ज हो सकते हैं।
सिंघवी ने अदालत से आग्रह किया कि आदेश में यह स्पष्ट किया जाए कि छोटे अपराधों और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को 'आपराधिक रिकॉर्ड' की श्रेणी से बाहर रखा जाए। उन्होंने कहा कि केवल हत्या, दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों को ही इस दायरे में रखा जाना चाहिए।
इस पर तुषार मेहता ने कहा कि सरकार द्वारा साझा की गई सूची में केवल दुष्कर्म, हत्या और पॉक्सो जैसे गंभीर अपराध शामिल थे। ड्राइविंग उल्लंघन जैसे मामलों को इसमें शामिल नहीं किया गया था।
इसके बाद अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 'आपराधिक रिकॉर्ड' से आशय केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है। तुषार मेहता ने भी कहा कि सरकार ने आदेश को इसी रूप में समझा है।
एसआईटी गठन पर अदालत की टिप्पणी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाता है, तो उसकी अध्यक्षता किसी पूर्व न्यायाधीश को सौंपी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एसआईटी के स्थान पर उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया जा सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने सुझाव दिया कि ऐसी समिति की अध्यक्षता किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को दी जानी चाहिए।
चीफ जस्टिस ने कहा कि जरूरत से अधिक बल प्रयोग करने वाले किसी भी पुलिस अधिकारी को अनुचित संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छात्र प्रदर्शन की आड़ में कोई आदतन अपराधी संरक्षण हासिल न कर सके।
पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल
वृंदा ग्रोवर ने कहा कि दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई आदेश नहीं है, जिसमें पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति दी गई हो या इस हथियार का उल्लेख किया गया हो। उन्होंने कहा कि याचिका का उद्देश्य पुलिस से आत्मरक्षा के साधन छीनना नहीं है, बल्कि यह कहना है कि इस विशेष हथियार का इस्तेमाल उचित नहीं है।
अगली सुनवाई 18 अगस्त को
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को तय की है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि अगली तारीख पर एसआईटी के गठन और समिति के कार्य संचालन से जुड़े नियमों पर भी विचार किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वह हिरासत में लिए गए लोगों को कानूनी सहायता देने के लिए निजामुद्दीन थाने गए थे, जहां उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने अदालत से कहा कि इस मामले से जुड़ी सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखा जा सकता है।
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