असम में शिक्षकों के प्रांतीयकरण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, नई नियुक्तियों पर रोक

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को दिया निर्देश
- प्रांतीयकरण योजना के तहत शिक्षकों को शामिल करने पर रोक
- याचिका में अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का दावा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को निर्देश दिया कि राज्य में सरकारी स्कीम (प्रोविंशियलाइजेशन) के तहत स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति या उन्हें शामिल न किया जाए।
क्या है पूरा मामला?
वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी सेवा में शामिल करने की कानूनी व्यवस्था के तहत राज्य सरकार उनकी तय वेतन, ग्रेच्युटी, पेंशन और छुट्टी के बदले नकद भुगतान (लीव एनकैशमेंट) से जुड़ी देनदारियां अपने ऊपर लेती है। इनका भुगतान राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए लागू मौजूदा नियमों के अनुसार किया जाता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी मोहना की पीठ ने जनहित याचिका के याचिकाकर्ताओं राजेश चौहान और माधव मुकुंद पुजारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार की दलीलों पर ध्यान दिया।
प्रांतीयकरण व्यवस्था को क्यों दी गई चुनौती?
जनहित याचिका में प्रांतीयकरण (प्रोविंशियलाइजेशन) व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कथित तौर पर निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के बिना सरकारी सेवाओं में प्रवेश की अनुमति देती है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या तर्क दिया?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है। ये अनुच्छेद सार्वजनिक रोजगार के मामलों में कानून के समक्ष समानता और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं।
किस अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी गई?
याचिका में विशेष रूप से असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। आरोप है कि इन प्रावधानों के तहत ऐसे लोगों के प्रांतीयकरण की अनुमति दी गई है, जिनके पास संसदीय अधिनियमों और शिक्षक पात्रता से जुड़े वैधानिक नियमों व विनियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं।
शिक्षकों के प्रांतीयकरण को लेकर क्या आपत्ति?
याचिका में शिक्षकों के प्रांतीयकरण से संबंधित प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि जिन लोगों के पास लागू कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं, उन्हें सरकारी और प्रांतीयकृत शैक्षणिक संस्थानों में कक्षा में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
याचिका में क्या मांग की गई है?
- असम सरकार को असम वेंचर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (प्रोविंशियलाइजेशन ऑफ सर्विसेज) एक्ट, 2011 और 2017 एक्ट के तहत प्रांतीयकृत सभी व्यक्तियों की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
- प्रस्तावित समीक्षा केवल इस बात की पुष्टि तक सीमित रखने की मांग की गई है कि संबंधित व्यक्तियों के पास लागू संसदीय अधिनियमों और वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित योग्यताएं हैं या नहीं।
- अधिकारियों को ऐसे व्यक्तियों को सरकारी या प्रांतीयकृत शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने की अनुमति देने से रोकने की मांग की गई है, जिनके पास निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं।
- राज्य और अन्य संस्थाओं को प्रांतीयकरण की प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षकों की किसी भी नई नियुक्ति शुरू करने या अनुमति देने से रोकने के लिए आदेश की मांग की गई है।
- सरकारी शिक्षण पदों पर भविष्य में होने वाली सभी नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 तथा शिक्षक योग्यता से जुड़े वैधानिक ढांचे के अनुरूप निष्पक्ष, पारदर्शी, योग्यता-आधारित और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के जरिए ही किए जाने की मांग की गई है।
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