केर और बेर का साथ, मर्यादा में रहना पड़ता है...: डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

केर और बेर का साथ, मर्यादा में रहना पड़ता है,
मर्यादा का चीरहरण, तो केर को फटना पड़ता है।
बनी रहे शान्ति जग में, ताक़त का अहसास ज़रूरी,
बुद्ध की प्रासंगिकता हेतु, युद्ध भी करना पड़ता है।
चाकू खरबूजे का रिश्ता, खरबूजे को कटना पड़ता है,
मुस्लिम हिन्दू भाईचारा, चारा दूजे को बनना पड़ता है।
पहला तो बस भाई ही है, अल्पसंख्यक पहचान बनी,
सदा सहिष्णु हिन्दू दोषी, उसको ही सहना पड़ता है।
नमक और दूध का रिश्ता, दूध को फटना पड़ता है,
मानवता हित विष घट तो, शिव को पीना पड़ता है।
सभी देवगण धर्म के हित, अस्त्र शस्त्र साथ में रखते,
सोच रहे बुद्ध बनकर जीना, अधर्मी से मरना पड़ता है।
उठो पार्थ! अस्त्र सँभालो, युद्धक्षेत्र में लड़ना पड़ता है,
भाई चारा मिथ्या भ्रम है, चक्रव्यूह में बढ़ना पड़ता है।
किंचित भी अवसाद करो ना, कौन बचा- कौन मरा,
धर्म पालन करना सीखो, धर्मयुद्ध में मरना पड़ता है।
अपने ही थे युद्ध क्षेत्र में, अपने विरुद्ध खड़े हुए थे,
धर्म पताका तज स्वार्थ में, अधर्मी संग खड़े हुए थे।
गुरु द्रोण भीष्म पितामह, निष्ठा बस सिंहासन संग,
मर्यादा के चीरहरण में, मौन समर्पण खड़े हुए थे।
डॉ. अ. कीर्ति वर्द्धन
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