यूपी में विनोद तावड़े की एंट्री अलग अंदाज में, स्वागत नहीं संगठन की समीक्षा होगी प्राथमिकता

HIGHLIGHTS
- विनोद तावड़े 5-6 सितंबर को यूपी के दौरे पर रहेंगे।
- कार्यकर्ताओं को स्वागत में भीड़ जुटाने से बचने को कहा गया।
- होर्डिंग, पोस्टर और बैनर लगाने पर भी रोक का संदेश।
भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद पहली बार राजधानी आने वाले पदाधिकारियों के स्वागत में जिस तरह होर्डिंग और पोस्टर लगाए गए थे, साथ ही बड़ी संख्या में भीड़ जुटने से यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई थी। इसे लेकर अब केंद्रीय नेतृत्व की नजर है।
इसी वजह से 5-6 सितंबर को अपने पहले आधिकारिक दौरे पर उत्तर प्रदेश आ रहे पार्टी के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने लखनऊ पहुंचने पर होर्डिंग, पोस्टर और बैनर नहीं लगाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से स्वागत के नाम पर होर्डिंग-पोस्टर लगाने और सड़कों पर भीड़ जुटाने से भी दूर रहने को कहा है। तावड़े के इस संदेश से साफ है कि इस बार शक्ति प्रदर्शन का पैमाना सड़कों पर जुटने वाली भीड़ नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता होगी।
सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश प्रभारी ने कार्यकर्ताओं को सड़क पर भीड़ नहीं जुटाने और स्वागत में होर्डिंग-पोस्टर से बचने की सख्त हिदायत दी है। माना जा रहा है कि तावड़े के स्वागत को राजनीतिक चमक-दमक का मंच बनाने के बजाय इसे संगठन की तैयारियों की समीक्षा के अवसर के रूप में इस्तेमाल करने का संदेश दिया गया है।
पिछले चुनावी दौर में विपक्ष ने बनाई थी पैठ
तावड़े का यह रुख केवल सादगी का संदेश नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2027 की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के साथ उन इलाकों में संगठन को दोबारा सक्रिय करने की चुनौती भी है, जहां पिछले चुनावी दौर में विपक्ष ने सेंध लगाई थी।
दो दिवसीय यूपी प्रवास के दौरान तावड़े प्रदेश संगठन के पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगे। इन बैठकों में बूथ स्तर की सक्रियता, संगठनात्मक समन्वय और चुनावी तैयारियों की समीक्षा की जाएगी।
इससे संकेत मिलते हैं कि तावड़े हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की ताकत और कमजोरियों का आकलन कागजी आंकड़ों से अधिक जमीनी स्थिति के आधार पर करना चाहते हैं। उनके द्वारा पोस्टर और स्वागत से दूरी बनाने के निर्देशों का राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तावड़े की बैठकों को प्रदेश संगठन और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से भी जोड़कर देखा जा रहा है। जिस क्षेत्र में संगठन कमजोर पाया जाएगा, वहां जिम्मेदार पदाधिकारियों से जवाब मांगा जा सकता है। साथ ही बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने के लिए नए लक्ष्य तय किए जाने की संभावना है।
इस लिहाज से 5 और 6 सितंबर का लखनऊ दौरा भाजपा के लिए पोस्टर और स्वागत का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मिशन-2027 की तैयारियों की समीक्षा का अवसर होगा। संदेश स्पष्ट है कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा अहम चुनाव के दिन बूथ पर पार्टी की ताकत नजर आना है।
बूथ पर पकड़ मजबूत करने की तैयारी
तावड़े के दौरे का सबसे अहम राजनीतिक पहलू मिशन-2027 को लेकर संगठन की जमीनी स्थिति की जांच है। विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा ने बूथ स्तर पर तैयारियां तेज करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।
बैठकों में बूथ समितियों की सक्रियता, पन्ना स्तर तक कार्यकर्ताओं की भूमिका, संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल तथा कमजोर इलाकों में पार्टी की स्थिति जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
शक्ति प्रदर्शन के बजाय काम का हिसाब
तावड़े के निर्देशों को भाजपा के भीतर बदलती कार्यशैली के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। आम तौर पर बड़े नेताओं के दौरे के दौरान कार्यकर्ता होर्डिंग-पोस्टर लगाने और सड़क पर भीड़ जुटाने में सक्रिय रहते हैं। इससे शक्ति प्रदर्शन का संदेश जाता है, लेकिन इसके साथ यातायात प्रभावित होने और आम लोगों को परेशानी होने का मुद्दा भी उठता है।
तावड़े ने इससे दूरी बनाकर संगठनात्मक कार्य को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है।
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