मुजफ्फरनगर: रामपुर तिराहा कांड से जुड़ी गायब मूल पत्रावलियों की फोटोकॉपी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के मामले में दोनों पक्षों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं। अब इस पर फैसला 11 फरवरी को सुनाया जाएगा। यह मामला अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-9 में न्यायाधीश ज्योति सिंह के समक्ष चल रहा है।
सीबीआई ने अदालत में कहा कि संबंधित मूल दस्तावेज पहले ही कोर्ट में दाखिल किए जा चुके थे, जिनकी रिसीविंग रिकॉर्ड में मौजूद है। एजेंसी ने तर्क दिया कि मूल फाइलें अब उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके समर्थन में सीबीआई ने अदालत में इंडेक्स और रिसीविंग की प्रतियां पेश कीं, जिनमें कुल 27 दस्तावेजों का विवरण शामिल है।
वहीं बचाव पक्ष ने आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना मूल दस्तावेजों के फोटोकॉपी को साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इस पर सीबीआई को बुधवार को अंतिम अवसर दिया गया, जिसमें अभियोजन अधिकारी ने अदालत में अपना पक्ष रखा। दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अदालत ने आदेश सुरक्षित रखते हुए 11 फरवरी की तारीख तय कर दी है।
क्या है रामपुर तिराहा मामला
1 अक्तूबर 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर देहरादून से दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने रोका था। देर रात हुई कार्रवाई के दौरान पुलिस फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी। बाद में सीबीआई ने मामले की जांच कर पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए थे।
तीन साल पहले मिल चुकी थी फोटोकॉपी की मंजूरी
रामपुर तिराहा कांड की फाइलों से जुड़े इस मामले में पिछले तीन वर्षों से सुनवाई चल रही है। वर्ष 2023 में तत्कालीन अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने फोटोकॉपी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लिया था, लेकिन बचाव पक्ष की आपत्ति के बाद इस पर दोबारा सुनवाई शुरू हुई। अब अदालत 11 फरवरी को अंतिम निर्णय सुनाएगी।