पेट्रोल-डीजल की बचत की अपील पर विपक्ष की चिल्ल-पों

ईरान-अमेरिका युद्ध तथा जलडमरू समुद्री जल मार्ग की बंदिश से त्रस्त हो कर 40 देशों को अपने यहां पेट्रोल की राशनिंग शुरू कर दी है, साथ ही उसके मूल्य में भी काफी वृद्धि कर दी है। विश्वभर के लोग ऊर्जा के इस विभीषक संकट से परिचित हो चुके हैं। इस वैश्विक संकट को समझने के उलट भारत का विपक्ष अलग ही ढ़पली बजा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल बचाने और सोने की खरीद एक वर्ष टालने की अपील क्या की पूरी चांडाल चौकड़ी हुआ-हुआ कर रेंकने लगी। नित्यप्रति प्रातः काल से गालियों का पिटारा खोलने वाले राहुल गांधी ने कहा- देश चलाना मोदी के बूते की बात नहीं तो जातिवाद-वंशवाद के पहरुवे अखिलेश यादव ने तो नरेंद्र मोदी से इस्तीफा ही मांग लिया, मानो देश की 140 करोड़ जनता ने इस्तीफा मांगने के लिए उन्हें डिक्टेटर नियुक्त किया हो।
विपक्ष की विकृत मानसिकता पर विचार से पूर्व अतीत के झरोखे को झांकना होगा। भारत-चीनी भाई-भाई का नारा लगाने वाले जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्वकाल में सन् 1962 में नेफा पर धावा बोल सीधी चुनौती दी थी। तब नेहरू जी ने आल इंडिया रेडियो से राष्ट्र के नाम खर्ची व स्वर्णदान की अपील जारी की थी। मुजफ्फरनगर के सैनिक भवन में सोना एकत्र करने का शिविर लगाया गया था। नेहरु सरकार द्वारा 14 कैरेट से अधिक के सोने के आभूषणों की खरीद पर आईपीसी के अधीन अपराध घोषित कर दिया गया था। नेहरू जी ने गोल्ड बॉन्ड जारी कर घरेलू सोना सरकारी खजाने में जमा कराया था।
सन् 1966 में इंदिरा गांधी ने सोने के विरुद्ध जंग ही छेड़ दिया था। लोगों से कहा- सोने की गुलामी छोड़ दो।
सन् 2013 में मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में एक नहीं, तीन-तीन बार सोना न खरीदने की अपील की थी, जो ज्यादा दिनों की बात नहीं।
सरकारी स्तर पर मंत्रियों, अधिकारियों द्वारा पेट्रोल की कमखर्ची अतीत में आदर्श प्रस्तुत किया गया था।
स्व. सी.बी. गुप्ता ने मुख्यमंत्री बनने पर बड़ी इम्पाला कारों की जगह कम खपत वाली फिएट कारें मंत्रियों के लिए खरीदी थी। कम खर्च पेट्रोल चालित फिएट की कीमत तब 9 हजार रुपये थी। गुप्ता जी के पास निजी कार नहीं थी। विपक्ष के नेता राज नारायण, अनंतराम जायसवाल, जेड.ए अहमद, कप्तान अब्बास अली, पैदल थे
मुझे अच्छी तरह स्मरण है, गांधीवादी विचित्र नारायण शर्मा ने मंत्री होते कार नहीं ली थी। साइकिल से सचिवालय जाते आते थे। काउंसिल हाउस से आते हुई हजरतगंज के पीछे वाली सड़क पर किसी वाहन ने उनकी साइकिल को टक्कर मार कर बुरी तरह लहूलुहान कर दिया था।
केरल की पहली गैर कांग्रेस राज्य सरकार के मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद सदा साइकिल से जाते-आते रहे। मुझे याद है कि प्रमुख कानूनविद् एमएलसी पंडित ब्रह्मप्रकाश सदा साइकिल पर चले। पूर्व विधायक मलखान सिंह सैनी पैदल ही चलते थे। अपने चुनाव में साइकिल से जन संपर्क करते थे। मुजफ्फरनगर जिले के शीर्षस्थ जाट परिवार के मुखिया, अपर दोआब चीनी मिल के डायरेक्टर ऑनरेरी मजिस्ट्रेट इन्द्र वर्मा (बड़े वर्मा जी) सार्वजनिक बस से मुजफ्फरनगर आते थे। शामली बस अड्डे से कचहरी तक पैदल जाते-आते थे।
रुड़की रोड, म्युनिसिपल गर्ल्स कॉलेज के सामने, डॉ. प्रेमसुख शर्मा की दुकान के समीप समाजवादी नेता और सांसद मुल्कीराज सैनी को सिर पर गठरी लिए हुए सहारनपुर बस स्टैंड की ओर जाते हुए देखा। आगरा विश्वविद्यालय के उपकुलपति शीतल प्रसाद जी रामबाग रोड से सरवट रोड स्थित 'देहात भवन' साइकिल से आते थे। इनकी आत्मा महान और देशप्रेम से आप्लावित थी। पैसे व साधनों का सदुपयोग देशकाल समयानुसार करते थे। अब तो लक्जरी गाड़ियां रखने वाले, मोंटे कार्लो की शर्ट पहनने वाले स्वयंभू नेता भी राष्ट्रहित देखने वालों की मज़ाक उड़ाते हैं। शायद यही इनका राजनीतिक एजेंडा है।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'
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