स्मृति शेषः भारतीय संस्कृति और भारत माता का वीर सैनिक मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी

उत्तराखंड राज्य के दो बार मुख्यमंत्री तथा केन्द्र में सड़क परिवहन मंत्री, सेना में मेजर जनरल रहे महान् राष्ट्रवादी, भारतीय अस्मिता के पहरूवे भुवन चंद्र खंडूरी का 91 वर्ष की आयु में देहरादून में निधन हो गया।
खंडूरी जी के सौम्य, मधुर किन्तु सुदृढ़-अनुशासित व्यावहार से मैं व्यक्तिगत रूप से परिचित हूं। दरअसल मुजफ्फरनगर रजिस्ट्री कार्यालय में काम करने वाले धर्मसिंह की बड़ी बेटी शशि तथा छोटी बेटी चित्रा देहरादून ब्याही हैं। मैंने उनसे मिलने देहरादून जाने का प्रोग्राम बनाया तब श्री खंडूरी जी से भेंट का कार्यक्रम भी बनाया।
धर्मसिंह की बेटी के सुसराल वाले गुरु रामराय जी के परम भक्त है। शशि के पति राजेन्द्र को साथ लेकर मैं खंडूरी जी के आवास पर पहुंचा। बंगले में भीतर गया तो प्रतीक्षालय का नजारा देखकर चौंक गया। कमरे में आगंतुक गण शांत मौन बैठे थे। रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति नाम लेकर मिलने वालों को बुलाता था और भीतर भेज देता। मात्र 2-3 मिनट में मिलने वाला बाहर आता और चुपचाप चला जाता। अजीब माहौल था। कोई चिल्ल पुकार नहीं, आपस में कोई बात नहीं। अजीब सा सन्नाटा, जीवन में किसी नेता के निवास पर ऐसा नहीं देखा था।
मैंने रिसेप्शन पर बैठे सज्जन को अपना विजिटिंग कार्ड दिया। वे बोले- 'अभी पहुंचाता हूं।' फिर कार्ड देकर वापिस आये और बोले- 'साहब अभी बुलायेंगे।'
रिसेप्शन से सभी लोग जा चुके थे। सहायक ने कहा- 'अब आप भीतर जाइये।'
मुझे देख कर खंडूरी जी खड़े हो गये। हंस कर तपाक से हाथ मिलाया। बोले- 'सब जा चुके हैं, तसल्ली से बात करेंगे।'
मैंने कहा- आपके दर्शन की तीव्र इच्छा थी, काम तो कोई नहीं। फिर मुजफ्फरनगर की चर्चा हुई, अखबार के बारे में पूछा। मैंने उन्हें शुकतीर्थ से मिली पुस्तक भेंट की और पूज्य चरण स्वामी कल्याण देव महाराज की महिमा का बखान किया। मैंने शुकतीर्थ पधारने का आग्रह किया। बोले- 'अवश्य आऊंगा, प्रेस में भी आऊंगा।'
मेरा दुर्भाग्य रहा कि महाराज श्री के रहते वे शुकतीर्थ न आ सके। खंडूरी जी की सौम्यता मिलनसारिता आज तक भूली नहीं है। मेरा उनके चरणो में शत-शत प्रणाम !
गोविंद वर्मा (संपादक 'देहात')
खंडूड़ी जी का राजनीतिक और सैन्य सफर
1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी का जीवन अनुशासन, सादगी और राष्ट्रसेवा की मिसाल माना जाता था। उनके पिता जय बल्लभ खंडूड़ी पत्रकार थे, जबकि उनकी मां दुर्गा देवी सामाजिक कार्यों से जुड़ी थीं। खंडूड़ी जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और सैन्य संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे भारतीय सेना की इंजीनियर्स कोर में शामिल हो गए। करीब 36 वर्षों तक सेना में सेवा देने के दौरान उन्होंने अपनी कड़क कार्यशैली और ईमानदार छवि से अलग पहचान बनाई।
1982 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। कहा जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी प्रशासनिक क्षमता और साफ छवि को देखते हुए उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने भाजपा के साथ अपना लंबा राजनीतिक सफर शुरू किया। वे कई बार गढ़वाल से सांसद चुने गए। केंद्र सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहने के साथ-साथ वे दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे।
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