नई दिल्ली: संसद में गुरुवार को कांग्रेस सांसद शशि थरूर और राहुल गांधी के बीच एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। बैठक के बाद थरूर ने मुस्कुराते हुए कहा, "सब ठीक है," जिससे पार्टी में चल रही मतभेद और असंतोष की खबरों पर फिलहाल विराम लग गया।
थरूर ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ हुई बातचीत को "बहुत रचनात्मक और सकारात्मक" बताया और स्पष्ट किया कि अब वे और पार्टी नेतृत्व एक ही दृष्टिकोण पर हैं।
पिछले विवाद क्या था?
कुछ महीनों से थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच तनाव की खबरें सामने आ रही थीं। थरूर ने पहले सार्वजनिक रूप से माना था कि उनके कुछ मुद्दे हैं, जिन्हें वे पार्टी के मंच पर उठाना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 17 साल से कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने कभी पार्टी के रुख का उल्लंघन नहीं किया।
विवाद तब शुरू हुआ जब थरूर पार्टी की एक अहम बैठक में शामिल नहीं हुए। उन्होंने बाद में बताया कि वे उस समय एक साहित्य उत्सव में गए थे और नेतृत्व को इसकी पहले से सूचना दे दी थी। इसके अलावा कोच्चि में हुए पार्टी कार्यक्रम में उनके साथ हुए कथित खराब व्यवहार की खबरों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी थी।
अफवाहें और असंतोष:
पार्टी के भीतर बेचैनी तब बढ़ी जब पिछले साल अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकट प्रबंधन की सराहना की थी। इस पर कई कांग्रेस नेताओं ने नाराजगी जताई। इसके बाद भाजपा ने उन्हें एक अंतरदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने का न्योता दिया, जिसे थरूर ने स्वीकार किया। दल में कोई और कांग्रेस नेता शामिल नहीं था, जिससे पार्टी में उनके भाजपा में जाने की अफवाहें उड़ीं।
तनाव तब और बढ़ गया जब थरूर ने प्रधानमंत्री के एक भाषण की सोशल मीडिया पर सराहना की और “भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय है” शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने वंशवाद की आलोचना की। थरूर ने हमेशा कहा कि उनकी टिप्पणियां राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि राष्ट्रहित से प्रेरित थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री की प्रशंसा का मतलब भाजपा में शामिल होना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता का संदेश है।