कार ओवरटेक करने पर बाइकसवारों को कराया गिरफ्तार, अब मजिस्ट्रेट को हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

HIGHLIGHTS
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ शक्तियों के दुरुपयोग मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला चीफ जस्टिस को भेजा।
- मामला बाइक सवारों से विवाद और उनकी गिरफ्तारी से जुड़ा है, जिसमें सीसीटीवी फुटेज का भी जिक्र हुआ।
- हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर रोक लगाते हुए न्यायिक अधिकारी के व्यवहार पर कड़ी टिप्पणी की।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुधवार (29 जुलाई) को शक्तियों के दुरुपयोग से जुड़े एक मामले में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई। मामला बाइक सवारों द्वारा मजिस्ट्रेट की गाड़ी को ओवरटेक करने और इसके बाद अधिकारी की शिकायत पर उनकी गिरफ्तारी कराए जाने से जुड़ा है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केस को सीधे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का निर्देश दिया, ताकि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ आगे अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके।
क्या है पूरा मामला?
लाइव लॉ के अनुसार, यह मामला सड़क पर हुए विवाद (रोड रेज) से जुड़ा है, जिसमें एक न्यायिक अधिकारी और दोपहिया वाहन सवारों के बीच विवाद हुआ था।
याचिकाकर्ताओं में एक 70-72 वर्षीय बुजुर्ग भी शामिल थे, जो दोपहिया वाहन से जा रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक न्यायिक अधिकारी की निजी कार को ओवरटेक किया। उस समय न्यायिक मजिस्ट्रेट अपने पति के साथ कार में मौजूद थीं।
बताया गया कि न्यायिक अधिकारी की कार तेज गति से चल रही थी। जब बाइक सवारों ने अधिकारी और उनके पति से वाहन की रफ्तार कम करने को कहा तो अधिकारी नाराज हो गईं।
इसके बाद न्यायिक अधिकारी और उनके पति ने दोपहिया वाहन का पीछा किया और उस स्थान तक पहुंचे, जहां याचिकाकर्ता एक मकान का निर्माण करा रहे थे। आरोप है कि अधिकारी कार से उतरकर एक आम व्यक्ति से विवाद करने लगीं। पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई।
घटना के बाद न्यायिक अधिकारी ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने दोपहिया वाहन सवार बुजुर्ग और उनके साथी को गिरफ्तार कर लिया।
हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
मामला हाईकोर्ट तब पहुंचा, जब गिरफ्तार किए गए दोनों बाइक सवारों ने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने की मांग को लेकर याचिका दायर की।
यह मामला मालुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि मालुर के वकीलों ने पहले ही प्रशासनिक न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपकर संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की थी। इसमें इस घटना के अलावा अधिकारी से जुड़ी अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया गया था।
हाईकोर्ट ने मामले में क्या कहा?
- न्यायिक पद के दुरुपयोग का उदाहरण
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने घटना और न्यायिक अधिकारी के रवैये पर नाराजगी जताई। अदालत ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कहा कि एक न्यायिक अधिकारी का केवल वाहन धीमा चलाने की बात कहने पर कार से उतरकर आम व्यक्ति से विवाद करना पूरी तरह अशोभनीय है।
अदालत ने इसे न्यायिक पद के दुरुपयोग का बड़ा उदाहरण बताया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी की जिम्मेदारी केवल अदालत कक्ष तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनका सार्वजनिक व्यवहार भी न्यायपालिका में लोगों के विश्वास को प्रभावित करता है।
- 'नागरिकों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं हो सकता'
हाईकोर्ट ने 70-72 वर्षीय बुजुर्ग सहित अन्य याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि केवल इसलिए किसी नागरिक को हिरासत में नहीं लिया जा सकता क्योंकि शिकायत करने वाला व्यक्ति न्यायिक अधिकारी है।
कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के कहने मात्र पर नागरिकों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं किया जा सकता।
जब सरकारी वकील ने न्यायिक अधिकारी से जुड़ी एक अन्य घटना का उल्लेख किया, जिसमें घर की मरम्मत नहीं करने पर एक पीडब्ल्यूडी अधिकारी को हिरासत में लेने का निर्देश दिया गया था, तो कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, "..क्या वह इसे अपनी निजी जागीर समझती है?..।"
अब न्यायिक मजिस्ट्रेट पर क्या कार्रवाई होगी?
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह पूरे आदेश और मामले को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश करे, ताकि संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके।
अदालत ने न्यायिक अधिकारी के व्यवहार को पद के अनुरूप नहीं माना है। ऐसे में उन्हें विभागीय जांच या अन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा, जिस शिकायत के आधार पर न्यायिक अधिकारी ने बाइक सवारों की गिरफ्तारी कराई थी, उस मामले में हाईकोर्ट ने आगे की पुलिस जांच पर भी रोक लगा दी है।
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