2027 की तैयारी में जुटी BJP, विनोद तावड़े ने गोरखपुर में तीन दिन तक टटोली सियासी नब्ज

HIGHLIGHTS
- विनोद तावड़े का प्रदेश प्रभारी बनने के बाद पहला गोरखपुर प्रवास
- तीन दिनों में वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों से की मुलाकात
- नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझने के लिए विद्यार्थियों से भी संवाद
- संगठन में सक्रिय और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं की जानकारी ली
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियों की शुरुआत गोरखपुर से की है। प्रदेश प्रभारी बनाए जाने के बाद राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का पहला गोरखपुर दौरा सिर्फ संगठनात्मक बैठक तक सीमित नहीं रहा। उनके तीन दिन के प्रवास में क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने की कोशिश दिखाई दी। तावड़े ने पहले लोगों की बातें सुनीं, फिर सवाल किए और एक व्यक्ति से मिले फीडबैक को दूसरे से क्रॉस चेक किया। संगठन से लेकर समाज तक अलग-अलग स्तर पर जानकारी जुटाई गई। पूरी कवायद का संकेत यही रहा कि पहले जमीन की बात सुनी जाए, फिर उसे समझा जाए और उसके बाद रणनीति तैयार की जाए।
पिछले चुनावों में बदली भाजपा की तस्वीर
भाजपा के मजबूत प्रभाव वाले गोरखपुर क्षेत्र में पिछले चुनावों के दौरान राजनीतिक तस्वीर बदली है। 13 लोकसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में भाजपा ने 2014 में 12 सीटें जीती थीं। 2019 में यह आंकड़ा घटकर 10 हुआ और 2024 में भाजपा के खाते में छह सीटें रह गईं। विधानसभा चुनाव में भी 2017 की 49 सीटों की तुलना में 2022 में भाजपा 35 सीटों तक सिमट गई।
ऐसे में 2027 की चुनौती केवल सत्ता बचाने की नहीं है, बल्कि पुराने गढ़ में बदल चुके समीकरणों को समझकर रणनीति तैयार करने और पहले जैसी ताकत हासिल करने की भी है।
नई पीढ़ी से संवाद, फिर पुराने चेहरों तक पहुंचे
तावड़े ने गोरखपुर प्रवास की शुरुआत नई पीढ़ी के साथ संवाद से की। सहजनवां के अटल आवासीय विद्यालय पहुंचकर उन्होंने विद्यार्थियों से मुलाकात की और जेन जी तथा जेन अल्फा की आकांक्षाओं को समझने की कोशिश की।
इसके बाद संवाद का दायरा लगातार बढ़ता गया। तीन दिनों में तावड़े संगठन के वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों के अलावा वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों से मिले। उन्होंने समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रमुख लोगों और प्रबुद्ध वर्ग से भी बातचीत की। कुछ मुलाकातें समूह में हुईं तो कुछ लोगों से उन्होंने अकेले में मुलाकात की।
इस तरह एक ही सवाल पर अलग-अलग लोगों से जानकारी लेने की कोशिश की गई, ताकि यह समझा जा सके कि जमीन पर वास्तव में क्या स्थिति है।
संगठन की ताकत और कमजोरियों का भी लिया फीडबैक
तावड़े ने संगठन की मजबूती और कमजोरियों को लेकर भी जानकारी ली। जिलों में चल रही गतिविधियों का फीडबैक लेने के साथ यह भी पूछा गया कि कौन सक्रिय है और कौन निष्क्रिय। किन जगहों पर कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और कहां गुटबाजी की स्थिति है, इसकी भी जानकारी ली गई।
उन्होंने यह भी जानने की कोशिश की कि बड़े नेताओं के बीच मतभेद कहां संगठन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आपसी संघर्ष में उलझे नेताओं के नाम जानने के साथ उन्होंने यह भी पूछा कि उनके बीच सुलह कौन करा सकता है।
पिछले दो चुनावों में मंडल से लेकर क्षेत्र तक जिम्मेदारी संभालने वाले ऐसे लोगों की भी जानकारी मांगी गई, जो दायित्व से मुक्त होने के बाद घर बैठ गए हैं। ऐसे लोगों की सूची भी मांगी गई है। साथ ही यह समझने का प्रयास किया गया कि किस व्यक्ति को दोबारा जोड़ने से राजनीतिक समीकरण मजबूत हो सकते हैं।
यानी केवल समस्या की पहचान ही नहीं, उसके समाधान की संभावनाएं तलाशने पर भी जोर रहा।
अमित शाह के 2014 वाले फॉर्मूले की झलक
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अमित उपाध्याय तावड़े की कार्यशैली को 2014 के चुनाव के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री और तत्कालीन यूपी प्रभारी अमित शाह की उत्तर प्रदेश में अपनाई गई रणनीति से जोड़कर देखते हैं।
उनके मुताबिक उस समय भी संगठन के साथ नाराज और घर बैठे कार्यकर्ताओं की बात सुनी गई थी। प्रबुद्ध वर्ग और स्थानीय प्रभाव रखने वाले लोगों से फीडबैक लिया गया था। अंतर यह है कि उस समय भाजपा सत्ता से बाहर थी और सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रही थी। इस बार पार्टी सत्ता में है और तीसरी बार जीतने की रणनीति पर काम कर रही है।
डॉ. अमित उपाध्याय के अनुसार समय के साथ इस प्रयोग में कुछ और चीजें जुड़ी हैं। इस बार फीडबैक का दायरा उस नई पीढ़ी तक भी पहुंचा है, जो संभव है कि इस चुनाव में वोट न डाले, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए परिवार को प्रभावित जरूर करे।
युवा क्या सोच रहे हैं, संगठन की स्थिति क्या है, समाज में क्या चल रहा है और स्थानीय राजनीति किस दिशा में जा रही है, तावड़े इन सभी पहलुओं को एक साथ समझने की कोशिश कर रहे हैं।
वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी में खुलकर अपनी बात रखने का मौका
तावड़े के गोरखपुर प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी मौजूद नहीं थे। योगी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन समारोह में शामिल होने काशी गए थे। पंकज चौधरी गोरखपुर तब पहुंचे, जब तावड़े तीन दिन का दौरा पूरा कर रवाना हो चुके थे।
इसे रणनीति का हिस्सा माना जाए या संयोग, लेकिन इससे स्थानीय नेताओं और पूर्व पदाधिकारियों को तावड़े के सामने खुलकर अपनी बात रखने का अवसर मिला। तावड़े ने यह संदेश भी दिया कि जो व्यक्ति अकेले में मिलना चाहता है, वह मिल सकता है।
इसके बाद कई लोगों ने संगठन और सरकार की कार्यशैली को लेकर अपनी बातें खुलकर रखीं।
थाना-तहसील और प्रशासनिक व्यवहार की शिकायतें
तावड़े से मुलाकात के दौरान चुनाव को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर भी चर्चा हुई। कई लोगों ने भ्रष्टाचार और महंगाई के साथ थाना और तहसील से जुड़ी मुश्किलों की जानकारी दी।
कुछ लोगों ने स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवहार को भी चुनावी मुद्दा बनने की आशंका जताई। इस तरह सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी का वास्तविक स्तर समझने की कोशिश भी इस फीडबैक प्रक्रिया का हिस्सा रही।
आरक्षण, पेपरलीक और रोजगार के मुद्दे भी सामने आए
सामाजिक समीकरणों को लेकर भी तावड़े के सामने अलग-अलग तरह की चिंताएं रखी गईं। आरक्षण को लेकर विभिन्न सामाजिक समूहों की चिंताओं की जानकारी दी गई।
सवर्ण समाज में यूजीसी के नियमों को लेकर नाराजगी का फीडबैक मिला, जबकि पिछड़ी और दलित जातियों में आरक्षण को लेकर चिंता की बात बताई गई। युवाओं के बीच पेपरलीक और रोजगार का मुद्दा भी सामने आया।
इसके अलावा यह फीडबैक भी मिला कि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण विपक्ष सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी का नैरेटिव तैयार कर रहा है और भ्रष्टाचार को भी इसी नैरेटिव से जोड़ रहा है।
तावड़े को यह भी बताया गया कि सोशल मीडिया पर विपक्ष का हमला भाजपा की तुलना में ज्यादा पैना दिखाई दे रहा है।
सियासी संतुलन साधने की भी कोशिश
तावड़े ने राजनीतिक संतुलन को लेकर भी मुलाकातें कीं। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल से उन्होंने उनके आवास पर मुलाकात की। दोनों के बीच संगठन और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई।
डॉ. अग्रवाल कई मौकों पर प्रशासन पर प्रोटोकॉल की अनदेखी का आरोप लगा चुके हैं। शहर के एक पुल के उद्घाटन में नहीं बुलाए जाने को लेकर भी उन्होंने सोशल मीडिया पर नाराजगी जताई थी।
तावड़े का सबसे पहले उनके घर जाना चर्चा का विषय बना। इसके अगले दिन वह गोरखनाथ मंदिर पहुंचे और गोरक्षपीठ के प्रति अपनी आस्था भी जताई।
इससे संगठन के भीतर के समीकरणों के साथ गोरखपुर की राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता को भी साथ साधने की कोशिश दिखाई दी।
सहयोगी दलों के गणित पर भी नजर
पूर्वांचल की राजनीति में सहयोगी दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। निषाद पार्टी अपने सामाजिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी चाहती है। ऐसे में सीटों का बंटवारा भाजपा के लिए अहम सवाल है।
तावड़े ने कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद के घर जाकर उनसे मुलाकात की। यह मुलाकात उस समय हुई, जब निषाद एक कार्यकर्ता की हत्या के मामले में सरकार के खिलाफ मुखर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने सपा नेता और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय से भी मुलाकात की थी।
तावड़े ने डॉ. संजय निषाद से उनके मुद्दों और क्षेत्रीय समीकरणों को समझा। इससे संकेत मिला कि भाजपा अपने सहयोगियों को केवल सीटों के गणित के बजाय उनके सामाजिक प्रभाव के नजरिये से भी देख रही है।
हर सीट की अलग कहानी समझने की कोशिश
तावड़े के प्रवास से यह सामने आया कि वह हर सीट की गहराई से जानकारी लेना चाहते हैं। संगठन कहां कमजोर है, किस जगह विधायक के खिलाफ असंतोष है, कहां जातीय समीकरण बदल रहे हैं और किन सीटों पर नए मतदाता निर्णायक हो सकते हैं, इन सभी पहलुओं को समझने की कोशिश की गई।
सहयोगी दल की भूमिका किन सीटों पर कितनी महत्वपूर्ण होगी और किन जगहों पर दबाव में नहीं आना है, इस पर भी ध्यान दिया गया।
यानी पूरे क्षेत्र के लिए एक ही फॉर्मूला अपनाने के बजाय सीट-दर-सीट रणनीति तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
नई पीढ़ी और पुराने संगठनात्मक ढांचे के बीच संतुलन की चुनौती
पुराने नेता अभी भी मैदान छोड़ना नहीं चाहते। अगर कोई छोड़ने की सोच भी रहा है तो परिवार को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी ओर वर्षों से अवसर की प्रतीक्षा में पार्टी के साथ काम कर रही नई पीढ़ी राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहती है। ऐसे में उसकी अपेक्षाओं को पूरा करना भी एक बड़ा सवाल है। महिलाओं की राजनीति में अधिक भागीदारी की अपेक्षा भी सामने आ रही है।
प्रवास के तीसरे दिन बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने अपनी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से जुड़े पत्रक तावड़े को सौंपे। ऐसे में उनके सामने पुराने नेताओं को संतुष्ट करने के साथ आम कार्यकर्ताओं और महिलाओं के लिए अवसर बनाने की चुनौती भी है।
गोरखपुर से पूरे प्रदेश के लिए संदेश
तावड़े का तीन दिन का गोरखपुर प्रवास मूल रूप से राजनीतिक ऑडिट जैसा रहा। संगठन की स्थिति समझी गई, कार्यकर्ताओं का मूड जाना गया, नेताओं के आपसी रिश्तों को परखा गया और सहयोगी दलों की अपेक्षाएं सुनी गईं।
इसके साथ ही जातीय समीकरणों की परतें समझने, नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को जानने और सरकार तथा संगठन के खिलाफ असंतोष की थाह लेने की कोशिश हुई।
पूरा फोकस इस बात को समझने पर रहा कि जहां नुकसान हुआ, वहां उसके कारण क्या थे; जहां जीत मिली, वहां जीत का आधार कितना टिकाऊ है और आगे जीत के लिए क्या करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. गोपाल प्रसाद के मुताबिक इस तीन दिनी मंथन का संदेश साफ है कि 2014 की तरह पहले जमीन की आवाज सुनी जाएगी, फिर उसकी परतों को समझा जाएगा और उसके बाद चुनावी रणनीति तैयार होगी।
उनका कहना है कि यह कवायद बताती है कि जीत के लिए भाजपा जो भी करना होगा, करेगी। टिकट कटने की जरूरत होगी तो कटेगा, सीट बदलने की जरूरत होगी तो बदली जाएगी और नए चेहरों पर भी खुले मन से विचार होगा। जरूरत के हिसाब से हर सीट की अलग रणनीति बनाई जाएगी।
इस तरह तावड़े की कार्यशैली का पहला संदेश गोरखपुर से यही निकला कि पहले सुनो, फिर समझो और उसके बाद रणनीति बनाओ। तावड़े एक महीने बाद दोबारा लौटने की बात कहकर गए हैं। ऐसे में गोरखपुर क्षेत्र 2027 की रणनीति के लिए बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला बन गया है।
गोरखपुर क्षेत्र में भाजपा की जीत की स्थिति
लोकसभा चुनाव (कुल 13 सीटें)
| वर्ष | जीती सीटें |
|---|---|
| 2014 | 12 |
| 2019 | 10 |
| 2024 | 06 |
विधानसभावार स्थिति (कुल 62 सीटें)
| वर्ष | जीती सीटें |
|---|---|
| 2017 | 49 |
| 2022 | 35 |
गोरखपुर क्षेत्र में जिलेवार सीटों का आंकड़ा
| जिला | विधानसभा की सीटें | लोकसभा की सीटें |
|---|---|---|
| गोरखपुर | 09 | 02 |
| महराजगंज | 05 | 01 |
| देवरिया | 07 | 02 |
| कुशीनगर | 07 | 01 |
| बस्ती | 05 | 01 |
| सिद्धार्थनगर | 05 | 01 |
| संतकबीरनगर | 03 | 01 |
| मऊ | 04 | 01 |
| आजमगढ़ | 07 | 02 |
| बलिया | 01 | 01 |
| कुल सीटें | 62 | 13 |
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