दृष्टिहीन होने पर नौकरी से हटाया, अब सुप्रीम कोर्ट ने दिलाया ₹1.25 करोड़ का मुआवजा

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीएफ की कार्रवाई को गलत बताते हुए पूर्व कांस्टेबल को ₹1.25 करोड़ मुआवजा देने का आदेश दिया।
- अदालत ने कहा कि सेवा के दौरान दिव्यांग हुए कर्मचारी को वैकल्पिक पद देना नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी है।
- केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने सेवा के दौरान गंभीर दृष्टि संबंधी दिव्यांगता का शिकार हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक पूर्व कर्मी के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सीआरपीएफ के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि बल ने एक जिम्मेदार और आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। अदालत ने पूर्व कांस्टेबल को 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
केंद्र की याचिका खारिज
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि सीआरपीएफ ने दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े कानून का पालन नहीं किया और कर्मचारी को वैकल्पिक पद देने के बजाय सेवा से बाहर कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि संबंधित कर्मचारी को उसकी शारीरिक स्थिति के अनुरूप किसी अन्य पद पर नियुक्त किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि यह कानून के तहत सरकारी संस्थानों की जिम्मेदारी है।
दिव्यांगता के बाद नौकरी से नहीं हटाया जा सकता
फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांगता का शिकार हो जाता है, तो उसे सीधे नौकरी से हटाना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में समान वेतन और सेवा लाभों के साथ किसी अन्य उपयुक्त पद पर तैनात करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि यदि तत्काल कोई पद उपलब्ध न हो तो संस्थान विशेष व्यवस्था के तहत अतिरिक्त पद (सुपरन्यूमेरी पोस्ट) भी सृजित कर सकता है। यह व्यवस्था दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से कानून में शामिल की गई है।
2002 की अधिसूचना का नहीं मिला लाभ
सुनवाई के दौरान सीआरपीएफ की ओर से वर्ष 2002 की एक अधिसूचना का हवाला दिया गया, जिसके तहत बल के लड़ाकू कर्मियों को दिव्यांगता संबंधी कुछ प्रावधानों से छूट दी गई थी। हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने कहा कि संबंधित कर्मचारी को वर्ष 1998 में चिकित्सकीय आधार पर अयोग्य घोषित किया गया था, जबकि अधिसूचना चार साल बाद जारी हुई थी। इसलिए बाद में जारी किया गया कोई नियम या अधिसूचना पुराने मामलों पर लागू नहीं की जा सकती।
क्या था मामला?
मामला सीआरपीएफ के एक ड्राइवर से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 1985 में बल में सेवा शुरू की थी। वर्ष 1996 में उन्हें गंभीर नेत्र रोग हुआ, जिसके कारण उनकी एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई, जबकि दूसरी आंख की दृष्टि भी प्रभावित हुई।
चिकित्सा जांच के बाद सीआरपीएफ मेडिकल बोर्ड ने उन्हें स्थायी रूप से सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद 11 मार्च 1998 को उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। कर्मचारी ने सेवा लाभ और वित्तीय अधिकारों की मांग की थी, लेकिन उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए बकाया वेतन, ब्याज और अन्य मदों को शामिल करते हुए 1.25 करोड़ रुपये के भुगतान का आदेश दिया है। हालांकि बहाली का आदेश लागू नहीं किया गया, क्योंकि कर्मचारी अब सेवानिवृत्ति की निर्धारित आयु पार कर चुके हैं।
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