सारा अली खान के समर्थन में उतरे हरीश रावत, फतवा जारी करने वाले मौलाना पर साधा निशाना

HIGHLIGHTS
- हरीश रावत ने शुक्रवार को एक्स पर अपना बयान जारी किया।
- उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक होने के लिए कट्टरपंथी होना जरूरी नहीं है।
- रावत के मुताबिक, सारा अली खान अपने पिता से मिले धर्म का भी पालन करती हैं।
बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान के केदारनाथ मंदिर जाने को लेकर धार्मिक विवाद सामने आया है। इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शुक्रवार को अभिनेत्री का समर्थन किया। उन्होंने सारा के मंदिर जाने पर सवाल उठाने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों की आलोचना की।
'व्यक्तिगत ध्यान पाने के लिए समाज को परेशान करते हैं ऐसे लोग'
हरीश रावत ने कहा कि कट्टरपंथी हुए बिना भी कोई व्यक्ति गहरी आध्यात्मिक आस्था रख सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत बयान जारी कर उन लोगों पर निशाना साधा, जो फतवे जारी कर रहे थे और सारा अली खान की निजी आस्था पर सवाल उठा रहे थे।
रावत ने समाज में धार्मिक अतिवाद के बढ़ते खतरे को लेकर भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसरवादी दोनों पक्षों में मौजूद हैं, जो सिर्फ व्यक्तिगत ध्यान आकर्षित करने के लिए समाज को परेशान करते हैं।
हरीश रावत ने किया सारा अली खान का समर्थन
अपने बयान में हरीश रावत ने कहा कि सारा अली खान नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर की पोती हैं। वह सैफ अली खान की बेटी हैं और उनकी अपनी धार्मिक आस्था है। वह अपने पिता से मिले धर्म का भी पालन करती हैं।
रावत ने रूढ़िवादी आलोचकों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इस तरह की असहिष्णुता देश को किस दिशा में ले जाएगी। उन्होंने कहा कि भक्ति और कट्टरता के बीच अंतर है। यदि किसी व्यक्ति की किसी देवता में आस्था है, तो उसे ऐसा करने से रोका नहीं जाना चाहिए।
मौलाना ने जारी किया था फतवा
इससे पहले बरेली के मौलाना और ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुफ्ती शाहबुद्दीन रजवी बरेलवी ने सारा अली खान के मंदिर जाने को लेकर फतवा जारी किया था। उन्होंने अभिनेत्री के मंदिर में पूजा करने और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने को इस्लामी कानून यानी शरिया के अनुसार नाजायज और हराम बताया था।
मौलाना ने सारा से शरिया के सिद्धांतों का उल्लंघन करने के लिए अल्लाह से माफी मांगने यानी तौबा करने की अपील की थी। उन्होंने एएनआई से कहा था कि शरिया के मुताबिक किसी भी मुस्लिम पुरुष या महिला का दूसरे धर्म की आस्था में शामिल होना, प्रार्थना करना और धार्मिक अनुष्ठान करना स्वीकार्य नहीं है।
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