भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का लॉन्च, स्काईरूट ने रचा नया इतिहास

HIGHLIGHTS
- स्काईरूट एयरोस्पेस के भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की लॉन्चिंग काउंटडाउन के दौरान 5 मिनट पहले रोक दी गई।
- विक्रम-1 का प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सुबह 11:30 बजे होना था, लेकिन टाइमर रुकने के कारण लॉन्च टल गया।
- स्काईरूट ने इससे पहले 2022 में विक्रम-S सबऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, अब विक्रम-1 को 450 किमी x 450 किमी की लो अर्थ ऑर्बिट तक भेजने की तैयारी है।
भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 कुछ देर बाद लॉन्च किया गया। इसका प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 11:30 बजे होना था, लेकिन लॉन्च से कुछ समय पहले काउंटडाउन रोक दिया गया था। बाद में रॉकेट को लॉन्च किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को भारत के पहले निजी तौर पर विकसित प्रक्षेपण यान विक्रम-1 के पहले कक्षीय प्रक्षेपण की सराहना की। उन्होंने इसे भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक "ऐतिहासिक नई सीमा" बताया और कहा कि यह देश के युवाओं की प्रतिभा और उद्यमशीलता की भावना को दर्शाता है।
क्या है मिशन आगमन?
मिशन आगमन विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इस मिशन के तहत स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमताओं की जांच करेगी।
इस रॉकेट का प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है।
विक्रम-1 रॉकेट की क्या खासियत है?
विक्रम-1 रॉकेट का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।
- विक्रम-1 एक 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए तैयार किया गया है।
- यह हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से बनाया गया है, जिससे इसका वजन कम और क्षमता अधिक होती है।
- कंपनी के अनुसार कार्बन फाइबर सबसे मजबूत स्टील की तुलना में करीब पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट की दक्षता बढ़ती है।
- रॉकेट में तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं और सबसे ऊपर एक ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है।
- यह मॉड्यूल एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।
विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 350 किलोग्राम तक का पेलोड पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
यह मिशन इतना अहम क्यों माना जा रहा है?
अब तक भारत में उपग्रहों को कक्षा में भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए किया जाता रहा है। अगर विक्रम-1 मिशन सफल होता है, तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम हो सकेंगी।
आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार, यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में क्या भेजा जाएगा?
मिशन आगमन के तहत कई पेलोड अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। इनमें बंगलूरू की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित लैब में तैयार किया गया डायमंड लोटस भी शामिल है।
इसके अलावा अजय कुमार मट्टेवाड़ा द्वारा बनाई गई माइक्रोआर्ट भी विक्रम-1 मिशन के साथ भेजी जा रही है। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है।
इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जिस पर "वंदे मातरम" लिखा है। स्काईरूट के अनुसार, इसके साथ कंपनी की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के शुभचिंतकों के हस्तलिखित संदेश भी भेजे जा रहे हैं।
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