SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हटाए गए वोटरों के डेटा को लेकर EC से मांगा जवाब

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल SIR प्रक्रिया से जुड़े वोटरों के दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्र-वार डेटा सार्वजनिक करने की मांग वाली PIL पर चुनाव आयोग, राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
- अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाली संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है, उसका काम वोटर लिस्ट की निगरानी और प्रबंधन तक सीमित है।
- याचिका में दावा किया गया है कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए गए और दावे-आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया में देरी हो रही है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग को एक जनहित याचिका (PIL) पर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस याचिका में SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं की ओर से दाखिल किए गए दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार डेटा सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब
यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की SIR कमेटी के चेयरमैन प्रसेनजीत बोस की ओर से दायर की गई थी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की।
वकील नेहा राठी द्वारा दायर याचिका में पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा विधानसभा क्षेत्रवार विवरण मांगा गया है। इसमें फॉर्म 6 और 7 के तहत दाखिल, स्वीकार और खारिज किए गए आवेदनों की संख्या के साथ-साथ अपीलीय ट्रिब्यूनल में लंबित और निपटाए गए मामलों की जानकारी मांगी गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकर नारायणन ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए बनाए गए 18 ट्रिब्यूनल के कामकाज में व्यावहारिक स्तर पर देरी और परेशानियां सामने आ रही हैं।
चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान पीठ ने बिहार SIR मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई ट्रिब्यूनल यह तय करता है कि कोई व्यक्ति SIR सूची में शामिल नहीं हो सकता, तो चुनाव आयोग को मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत नागरिकता निर्धारण के लिए केंद्रीय मंत्रालय को भेजना होगा।
पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय करने के लिए संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है। कानून में इस संबंध में कोई भ्रम नहीं है। चुनाव आयोग को मतदाता सूची की निगरानी और नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है।
वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि करीब 33.5 लाख अपीलें अभी भी लंबित हैं। उन्होंने कहा कि जिन मामलों का निपटारा हुआ है, उनमें करीब 70 प्रतिशत दावे स्वीकार किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि फैसला आने तक कई लोगों को PDS और अन्य योजनाओं से बाहर रखा जा रहा है।
25 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने SIR मामले से जुड़ी पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका समेत अन्य लंबित मामलों के साथ इस नई याचिका पर भी 25 अगस्त को सुनवाई करने पर सहमति जताई है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है। इसमें दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान गणना चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
याचिका के अनुसार, दावे और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए फॉर्म 6 और 6A के तहत 9.64 लाख से अधिक आवेदन मिले, जबकि नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 के तहत 99 हजार से ज्यादा आवेदन प्राप्त हुए। हालांकि, 28 फरवरी को जारी अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नाम ही जोड़े गए।
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