लखनऊ: हाईकोर्ट में पुलिस की अवैध दबिश, वकीलों का विरोध; तीन पुलिसकर्मी निलंबित

गो तस्करी से जुड़े एक मामले में फरार चल रही महिला आरोपी की तलाश में सोमवार दोपहर दो उपनिरीक्षक और एक सिपाही लखनऊ हाईकोर्ट पहुंचे। आरोप है कि उन्होंने बिना अनुमति एक अधिवक्ता के चैंबर में घुसकर महिला को पकड़ने की कोशिश की और वहां मौजूद लोगों को धमकाया।
इस घटना से नाराज़ अधिवक्ताओं ने पुलिसकर्मियों को घेर लिया और हाईकोर्ट परिसर में इस तरह की कार्रवाई का विरोध किया। स्थिति बिगड़ती देख सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दी गई। कुछ ही देर में विभूतिखंड थाने की टीम मौके पर पहुंची और तीनों पुलिसकर्मियों को बाहर निकालकर मामला शांत कराया।
घटना के बाद अधिवक्ता सज्जाद हुसैन और हाईकोर्ट के निबंधक (सुरक्षा) शैलेंद्र कुमार ने तीनों के खिलाफ झूठी जानकारी देकर प्रवेश करने, आपराधिक अतिचार, धोखाधड़ी और धमकी देने की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई। मामला वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने के बाद डीसीपी पश्चिम विश्वजीत श्रीवास्तव ने तीनों को देर रात निलंबित कर दिया।
ऐसे खुला मामला
ऊंचाखेड़ा निवासी सुशील कुमार ने 14 जनवरी को काकोरी थाने में अमीनाबाद निवासी मो. वासिफ के खिलाफ उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धाराओं 3, 4 और 8 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। जांच के दौरान आमिना खातून का नाम सामने आने पर उसे भी आरोपी बनाया गया।
सोमवार को काकोरी थाने के दरोगा उस्मान खान, लाखन सिंह और सिपाही पुष्पेंद्र सिंह को सूचना मिली कि आमिना हाईकोर्ट परिसर में अपने अधिवक्ता रिश्तेदार गुफरान सिद्दीकी से मिलने आई है। इसके बाद तीनों ने हाईकोर्ट में प्रवेश की पर्ची बनवाई और सीधे गुफरान के चैंबर नंबर 515, ब्लॉक-सी पहुंच गए।
जैसे ही पुलिस ने आमिना को पकड़ने का प्रयास किया, आसपास मौजूद वकील एकत्र हो गए और विरोध शुरू हो गया। देखते ही देखते मामला बढ़ गया और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
गलत जानकारी देकर किया प्रवेश
निबंधक (सुरक्षा) शैलेंद्र कुमार ने अपनी तहरीर में बताया कि पुलिसकर्मियों ने एडवोकेट जनरल/सीएससी कार्यालय जाने की बात दर्ज कराई थी, जबकि वे सीधे अधिवक्ता के चैंबर पहुंचे। जिस एफआईआर संख्या 320/25 का हवाला दिया गया, वह उस दिन हाईकोर्ट में सूचीबद्ध भी नहीं थी।
किन धाराओं में मुकदमा
तीनों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई है, जिनमें आपराधिक अतिचार, धमकी, जानबूझकर अपमान, गलत सूचना देकर सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग और धोखाधड़ी शामिल हैं। इन धाराओं में तीन महीने से लेकर सात वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
बिना अनुमति नहीं होती ऐसी कार्रवाई
हाईकोर्ट जैसे संवेदनशील परिसर में पुलिस को किसी भी प्रकार की तलाशी, गिरफ्तारी या दबिश के लिए संबंधित रजिस्ट्रार या न्यायिक अधिकारी की अनुमति जरूरी होती है। नियमों का पालन न करने के कारण ही यह मामला विवाद का कारण बना।
बाहर पकड़ने में चूक बनी वजह
सूत्रों के अनुसार, पुलिस को महिला की लोकेशन हाईकोर्ट के बाहर ही मिल गई थी, लेकिन उससे पहले वह परिसर में दाखिल हो गई। नियमों का पालन करते हुए बाहर इंतजार करने के बजाय पुलिस ने चैंबर में दबिश दी, जिसके चलते यह पूरा विवाद खड़ा हुआ।
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