इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गंभीर मामलों में आरोपी वकील नहीं कर सकेंगे वकालत

HIGHLIGHTS
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सात साल से ज्यादा सजा वाले गंभीर मामलों में आरोपी वकील निर्दोष साबित होने तक अदालत में पेशी और बहस नहीं कर सकेंगे।
- कोर्ट ने यूपी बार काउंसिल को फर्जी डिग्री के आधार पर पंजीकृत 105 वकीलों के खिलाफ एफआईआर और अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए।
- हाईकोर्ट ने बताया कि उत्तर प्रदेश में 4,157 वकीलों पर 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं और लंबित मामलों को दूसरे जिलों में ट्रांसफर करने की योजना बनाने का आदेश दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सात साल से अधिक सजा वाले गंभीर आपराधिक मामलों में नामजद वकील तब तक किसी भी अदालत में पेश नहीं हो सकेंगे और न ही बहस कर पाएंगे, जब तक वे निर्दोष साबित नहीं हो जाते। ऐसे वकीलों का ट्रायल उनके गृह जिले से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले दूसरे जिले में कराया जाएगा।
प्रदेश के दागी वकीलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने कहा कि जब सत्ता और अधिकार रखने वाले लोग अन्याय के खिलाफ चुप रहते हैं तो इसका असर केवल अपराधियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निर्दोष लोगों और आने वाली पीढ़ियों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोगों की मौजूदगी न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने के साथ ही गंभीर संस्थागत और नैतिक संकट पैदा कर रही है।
इटावा के एक अधिवक्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 61 पेज के फैसले में यूपी बार काउंसिल के सचिव को फर्जी डिग्री के आधार पर पंजीकरण कराने वाले 105 वकीलों के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की एफआईआर दर्ज कराने तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने अधिवक्ता पंजीकरण के लिए पुलिस वेरिफिकेशन को अनिवार्य करने का सुझाव भी दिया है। साथ ही बार काउंसिल और विश्वविद्यालयों के बीच डिजिटल लिंक बनाने की बात कही है, जिससे डिग्रियों का रियल टाइम सत्यापन किया जा सके। हाईकोर्ट ने निर्देशों के पालन की रिपोर्ट तलब करते हुए मामले को 20 अगस्त को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।
प्रदेश में 4,157 दागी वकीलों पर 5,056 मामले दर्ज
कोर्ट ने बार काउंसिल की ओर से पेश रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश में 4,157 अधिवक्ता आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। इन वकीलों के खिलाफ कुल 5,056 मामले दर्ज हैं। इनमें 418 अधिवक्ता ऐसे हैं, जिन पर तीन या उससे अधिक मुकदमे दर्ज हैं।
कोर्ट ने कहा कि 28 अधिवक्ता ऐसे भी हैं, जिनके खिलाफ 11 या उससे अधिक गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके अलावा सत्यापन प्रक्रिया में 105 अधिवक्ताओं की पहचान हुई है, जिन्होंने फर्जी शैक्षणिक डिग्री (एलएलबी, स्नातक आदि) के आधार पर पंजीकरण हासिल किया। हालांकि, कोर्ट ने इन आंकड़ों को प्रारंभिक बताते हुए कहा कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
बार काउंसिल की सत्यापन प्रक्रिया पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने यूपी बार काउंसिल की पंजीकरण प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था काफी कमजोर है और यह केवल स्व-घोषणा तथा साथी अधिवक्ताओं के प्रमाण पर आधारित है।
कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता के नामांकन के समय न तो चरित्र सत्यापन कराया जाता है और न ही डिग्री का विश्वविद्यालय स्तर पर स्वतंत्र सत्यापन किया जाता है।
लंबित मामलों को दूसरे जिलों में भेजने के निर्देश
हाईकोर्ट ने महानिबंधक को निर्देश दिया है कि 30 दिनों के भीतर वकीलों के लंबित मुकदमों को पड़ोसी जिलों में स्थानांतरित करने की योजना की अधिसूचना जारी की जाए। कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था अगले पांच वर्षों के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू होगी।
इन मामलों की सुनवाई के लिए जिला जज के अधीन विशेष अदालतें गठित की जाएंगी और संबंधित जिला जज इन मामलों की निगरानी करेंगे।
कोर्ट ने कहा कि वकील अदालत के अधिकारी होते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ अधिवक्ताओं के आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के मामले सामने आए हैं। ऐसे वकील अपने जिले में साथी अधिवक्ताओं के समूहों के साथ मिलकर निष्पक्ष सुनवाई में बाधा पैदा करते हैं।
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