मौलाना फजलुर रहमान का पाक सेना पर हमला, बोले- राजनीति करनी है तो वर्दी उतारकर चुनाव लड़ें

HIGHLIGHTS
- पाकिस्तान के धार्मिक नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सेना पर राजनीति में दखल देने और संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन का आरोप लगाया।
- कसूर की रैली में उन्होंने कहा कि सेना को राजनीति करनी है तो वर्दी छोड़कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए।
- उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को लेकर सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान पर सवाल उठाए।
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में वह देश की सेना और सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका पर सवाल उठाते नजर आ रहे हैं। उन्होंने सेना पर संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर राजनीति में दखल देने और अशांत इलाकों में शासन व्यवस्था बहाल करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया है।
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने पंजाब के कसूर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सेना को अपने संवैधानिक अधिकारों और जिम्मेदारियों तक सीमित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर सैन्य अधिकारी राजनीति में आना चाहते हैं तो उन्हें वर्दी छोड़कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए।
उन्होंने कहा, "अगर राजनीति करनी है तो वर्दी उतारकर आएं और चुनाव लड़ें। फिर पता चल जाएगा कि जनता वर्दी पहनने वालों को कितना समर्थन देती है।"
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की स्थिति पर उठाए सवाल
मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति को लेकर भी सरकार और सेना पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि बलूचिस्तान के कई हिस्सों में राज्य की पकड़ कमजोर हुई है और अब हिंसा का असर खैबर पख्तूनख्वा तक फैल रहा है।
उन्होंने कहा कि देश में हालात बिगड़ रहे हैं और सवाल उठाया कि जब राज्य की व्यवस्था कमजोर हो रही है तो जिम्मेदार लोग कहां हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान में लंबे समय से विद्रोह जैसी स्थिति बनी हुई है और कई इलाकों में सरकार का प्रभाव सीमित हो गया है।
सेना प्रमुख के बयान के बाद बढ़ा विवाद
फजलुर रहमान की यह टिप्पणी पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ लड़ाई में आम लोगों से सेना का साथ देने की अपील की थी।
मौलाना ने इस अपील पर आपत्ति जताते हुए कहा कि देश की रक्षा करना सेना की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नागरिकों से सेना की लड़ाई लड़ने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।
'देश की रक्षा के लिए सेना को वेतन मिलता है'
जेयूआई-एफ प्रमुख ने कहा कि सैनिकों को देश की सुरक्षा के लिए ही जिम्मेदारी दी जाती है। उन्होंने कहा कि सेना के जवानों को इसी काम के लिए वेतन मिलता है और नागरिकों पर इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सेना को जनता के टैक्स से वेतन मिलता है, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उसी के दायरे में आती है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सेना की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है।
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