विजयादशमी पर मोहन भागवत का संदेश, बोले- बंटने से कमजोर हुआ समाज

HIGHLIGHTS
- नागपुर में विजयादशमी समारोह के दौरान मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया।
- संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती का उल्लेख करते हुए उनके संदेशों को याद किया।
- भागवत ने कहा कि आपसी विभाजन से समाज की ताकत और जुड़ाव कमजोर हुआ।
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजन किया। उन्होंने नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जब हम विभाजित हुए, तो कमजोर हो गए।
संत रविदास के संदेश का किया उल्लेख
विजयादशमी उत्सव के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि पिछले एक साल में संघ के शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। आज सभी विजयादशमी मनाने के लिए एकत्र हुए हैं।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती है। जिस समय देश विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों का सामना कर रहा था और स्वधर्म का पालन करने वालों पर अत्याचार हो रहे थे, उस दौर में संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश दिया। भागवत के अनुसार, संत रविदास ने अपने जीवन के उदाहरण से समाज को सांत्वना दी, लोगों का मनोबल बढ़ाया और उनके गुणों को बनाए रखने में योगदान दिया।
‘बंटने की वजह से कमजोर हुए’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सनातन दृष्टिकोण से जुड़ी भावना ने समाज को लचीलापन दिया। जब लोगों ने इस भावना को समझा और अपनाया तथा इसे भाषा, जाति, संप्रदाय और समुदाय से जुड़ी भावनाओं से ऊपर रखा, तब भावनात्मक एकता और भारतीय राष्ट्रीयता की भावना सर्वोपरि रही। उनके मुताबिक, उस समय भारत हर लिहाज से दुनिया के सामने आदर्श था।
भागवत ने कहा कि जब लोगों ने इस भावना को भुला दिया, तो आपसी जुड़ाव और अपनेपन की अनुभूति भी कमजोर पड़ गई। इससे समाज में विभाजन हुआ और लोग कमजोर हो गए। उन्होंने कहा कि कमजोरी के कारण मन में डर बैठ गया और दुनिया को लेकर चिंता बढ़ने लगी। उनके अनुसार, कमजोर व्यक्ति खुद को दीवारों के भीतर सीमित कर लेता है और इसी तरह समाज ने भी खुद को सीमित कर लिया।
‘दुनिया का ध्यान भारत की ओर गया है’
मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित हुआ है। देश का कद बढ़ने और प्रगति के साथ भारत को लेकर लोगों की जिज्ञासा भी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोग पर आधारित जीवनशैली कई समस्याएं पैदा कर रही है। भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद लोग इन समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। भागवत के अनुसार, दुनिया के सामने विविधता को साथ लेकर चलने, विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाने, अलग-अलग लोगों के साथ अपनापन बनाए रखने तथा पारिवारिक जीवन के पतन और नई पीढ़ी में मूल्यों के क्षरण को रोकने जैसी चुनौतियां हैं।
दुनिया में हो रहे प्रदर्शनों पर भी बोले
भागवत ने कहा कि पश्चिम से उठने वाली आंधी से सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने फ्रांस और अल्बानिया में हो रही घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में भी इस तरह के प्रयास हो रहे हैं और यहां गलत आचरण नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन समाधान का रास्ता समाज से ही निकलना चाहिए। उनके अनुसार, आंदोलन का उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सस्ती लोकप्रियता के लिए लोगों को उकसाने वाले लोग मौजूद हैं।
‘भारत के प्रति हमारा जुड़ाव बिना शर्त है’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत के लोगों की एकता स्वाभाविक है और दिल से आती है। यह किसी सौदे या अनुबंध पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि भारत से कुछ मिलने पर ही कोई खुद को भारतीय माने। भारत कुछ दे या न दे, लोगों का सब कुछ भारत का ही है।
भागवत ने कहा कि संघ में हिंदू भावना को मजबूत करने और संगठित व सशक्त हिंदू समाज बनाने की बात करने का अर्थ अन्य धर्मों के प्रति आपसी सम्मान या राष्ट्रीय एकता का विरोध करना नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदू सोच और चरित्र स्वभाव से सभी को साथ लेकर चलने वाले हैं। इसलिए यह प्रयास भावनात्मक एकता, सद्भावना और नैतिक अखंडता को बढ़ावा देता है।
कैप्टन स्मित मच्छार का भी किया जिक्र
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसी संस्कार से प्रेरित होकर स्मित मच्छार ने हाल ही में जो किया, वह स्वाभाविक था। भागवत के मुताबिक, उस परिस्थिति में क्या करना है, इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया गया था, बल्कि परीक्षा की घड़ी में उनके भीतर के संस्कार और परंपराएं सामने आ गईं।
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