NCW प्रमुख विजया राहतकर बोलीं- व्यवस्था महिला तक पहुंचे, उसे सिस्टम के पीछे न भागना पड़े

HIGHLIGHTS
- विजया राहतकर ने प्रोटेक्शन ऑफिसर्स के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया।
- प्रोटेक्शन ऑफिसर्स की नियुक्ति घरेलू हिंसा कानून के तहत राज्य सरकारें करती हैं।
- ये अधिकारी संकट में फंसी महिलाओं के लिए शुरुआती मदद का काम करते हैं।
राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की प्रमुख विजया राहतकर ने बुधवार को एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि मुश्किल में फंसी महिलाओं तक व्यवस्था को खुद पहुंचना चाहिए, न कि महिलाओं को मदद के लिए व्यवस्था के पीछे भागना पड़े।
घरेलू हिंसा के मामलों में सुरक्षा और न्याय को मजबूत करने के लिए प्रोटेक्शन ऑफिसर्स (सुरक्षा अधिकारियों) के राष्ट्रीय सम्मेलन में राहतकर ने कहा कि जिस महिला को सुरक्षा की जरूरत है, उसे यह भरोसा मिलना चाहिए कि वह अकेली नहीं है और सिस्टम उसके साथ खड़ा है।
उन्होंने बताया कि प्रोटेक्शन ऑफिसर्स की नियुक्ति राज्य सरकारों की ओर से ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के तहत की जाती है। ये अधिकारी संकट में फंसी महिलाओं के लिए शुरुआती मदद के तौर पर काम करते हैं।
राहतकर ने कहा कि प्रयास यह होना चाहिए कि व्यवस्था महिला तक पहुंचे और महिला को व्यवस्था तक पहुंचने के लिए संघर्ष न करना पड़े। उन्होंने प्रोटेक्शन ऑफिसर्स और अन्य एजेंसियों के काम में तकनीक की भूमिका पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म, हेल्पलाइन, डेटा और ऑनलाइन सिस्टम के जरिए प्रतिक्रिया देने की प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
तकनीक और व्यवस्था को लेकर क्या कहा?
राहतकर ने कहा, “हमें यह याद रखना चाहिए कि तकनीक व्यवस्था को तेज तो बना सकती है, लेकिन यह अपने-आप संवेदनशीलता नहीं ला सकती। इसलिए हमें तकनीक के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण, सहानुभूति और डेटा-आधारित दृष्टिकोण को भी अपनाना होगा।”
उन्होंने कहा कि देश ऐसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां किसी महिला को अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ताकत साबित करने की जरूरत न पड़े, बल्कि व्यवस्था ही उसकी ताकत बने। सुरक्षा केवल कानून की किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरतमंद महिला के जीवन में भी दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि देश ऐसे दौर की ओर बढ़ रहा है, जहां न्याय केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि हर महिला का वास्तविक अनुभव हो। उनके अनुसार महिलाओं के लिए सरकार सिर्फ एक कार्यालय या व्यवस्था नहीं, बल्कि मुश्किल समय में भरोसेमंद सहारा है।
‘महिला सुरक्षा और गरिमा से न हो कोई समझौता’
विजया राहतकर ने कहा कि किसी महिला को सुरक्षा देने का अर्थ सिर्फ उसे वर्तमान में सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसके भविष्य को सुरक्षित करना भी है।
उन्होंने कहा, “हमें ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ना होगा जहां कोई भी महिला अकेली न हो, किसी की आवाज अनसुनी न रहे और किसी भी महिला की गरिमा से कोई समझौता न हो।”
राहतकर ने कहा कि प्रोटेक्शन ऑफिसर का पद केवल सरकारी पद या प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं है। इस भूमिका के लिए कानून की जानकारी के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की संस्कृति ने हमेशा यह सिखाया है कि संकट के समय किसी भी महिला को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।
‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ का क्यों किया जिक्र?
राहतकर ने कवि कालिदास की रचना ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि जब शकुंतला अपने अधिकार और न्याय के लिए राजा दुष्यंत के दरबार में जाना चाहती थीं, तब उन्हें चिंता थी कि वह अपना पक्ष किसके सामने रखें।
उन्होंने कहा कि उस समय शकुंतला अकेली नहीं थीं। माता गौतमी उनके साथ खड़ी थीं और शाही दरबार तक उनके साथ गईं। राहतकर के अनुसार, माता गौतमी ने उस समय एक प्रोटेक्शन ऑफिसर की भूमिका निभाई थी, यानी ऐसी व्यक्ति की भूमिका जो मुसीबत में फंसी महिला को अकेला नहीं छोड़ता और उसे न्याय के दरवाजे तक पहुंचने में मदद करता है।
राष्ट्रीय सम्मेलन में मौजूद प्रोटेक्शन ऑफिसर्स से उन्होंने कहा, “अक्सर महिलाओं के लिए प्रोटेक्शन ऑफिसर ही सरकार का सबसे जाना-पहचाना चेहरा होता है। संसद कानून बनाती है, सरकार नीतियां बनाती है और संस्थाएं ढांचा तैयार करती हैं, लेकिन महिलाएं उस पूरे सिस्टम का अनुभव आपके दफ्तर में ही करती हैं।”
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