नर्मदा से सोन तक पानी पहुंचाने का रास्ता तैयार, विंध्य पर्वत में बनी 12 किमी लंबी सुरंग पूरी

HIGHLIGHTS
- कटनी के स्लीमनाबाद में विंध्य पर्वत के बीच बनी करीब 12 किलोमीटर लंबी नर्मदा-सोन लिंक सुरंग का निर्माण कार्य पूरा हो गया है।
- टनल बोरिंग मशीन अंतिम छोर तक पहुंच चुकी है, अब मशीनों को बाहर निकालने के बाद नहर में नर्मदा जल छोड़ा जाएगा।
- करीब 1500 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंगों में शामिल है, जो गुरुत्वाकर्षण के जरिए पानी पहुंचाएगी।
भोपाल। मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के पानी को सोन नदी बेसिन तक पहुंचाने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद क्षेत्र में विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच बनाई गई करीब 12 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग का निर्माण पूरा हो गया है। इस सुरंग के जरिए नर्मदा का पानी आगे के क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NBDA) के अधिकारियों के अनुसार, 14 जुलाई को टनल बोरिंग मशीन (TBM) सुरंग के आखिरी छोर पर बने सीमेंटेड कुएं तक पहुंच गई। इसके साथ ही सुरंग खुदाई का सबसे अहम चरण पूरा हो गया है। अब केवल मशीनों को बाहर निकालने और अन्य तकनीकी कार्य पूरे करने बाकी हैं।
डेढ़ महीने में बाहर निकाली जाएंगी मशीनें
NBDA के एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया कि सुरंग निर्माण में इस्तेमाल की गई अत्याधुनिक मशीनों को बाहर निकालने का काम शुरू किया जाएगा। करीब डेढ़ महीने में यह प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है। इसके बाद नहर में नर्मदा जल प्रवाहित किया जा सकेगा।
सदियों पुरानी कहानी को मिला नया रूप
नर्मदा और सोनभद्र को लेकर मध्य भारत में एक लोकप्रिय लोककथा प्रचलित है। मान्यता है कि दोनों नदियां मैकल पर्वत से निकलने के बाद अलग-अलग दिशाओं में बहने लगीं और कभी एक-दूसरे से नहीं मिल सकीं।
अब आधुनिक इंजीनियरिंग ने विंध्य की चट्टानों के बीच से रास्ता बनाकर नर्मदा के जल को सोन बेसिन तक पहुंचाने का काम पूरा कर दिया है। यह परियोजना प्राकृतिक दूरी को तकनीक के जरिए कम करने का उदाहरण बन गई है।
2011 में शुरू हुआ था काम
नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना के तहत स्लीमनाबाद सुरंग का निर्माण वर्ष 2011 में शुरू किया गया था। सलैया फाटक से खिरहनी गांव तक बनाई गई इस सुरंग के निर्माण में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं।
परियोजना का डाउन स्ट्रीम हिस्सा पहले ही पूरा हो चुका था, जबकि अप स्ट्रीम कार्य में देरी के कारण समय सीमा बढ़ानी पड़ी। अब टनल बोरिंग मशीन के अंतिम स्थान तक पहुंचने के साथ ही सुरंग निर्माण का मुख्य काम पूरा हो गया है।
अमेरिका और जर्मनी की मशीनों से हुई खुदाई
इस विशाल सुरंग को बनाने के लिए अमेरिका और जर्मनी से अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीनें मंगाई गई थीं। इन्हें बाहर निकालने के लिए करीब 100 फीट गहरा सीमेंटेड कुआं तैयार किया गया है। मशीनों को अलग-अलग हिस्सों में खोलकर क्रेन की मदद से बाहर निकाला जाएगा।
सुरंग के अंदर बिछाई गई पटरी और अन्य निर्माण सामग्री भी हटाई जाएगी।
1500 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई सुरंग
जब परियोजना शुरू हुई थी, तब इसकी अनुमानित लागत करीब 799 करोड़ रुपये थी। काम बढ़ने और तकनीकी चुनौतियों के कारण इसकी लागत बढ़कर लगभग 1500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
करीब 11.952 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली यह सुरंग देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंगों में शामिल है। खास बात यह है कि इसमें पानी का प्रवाह पंपों पर निर्भर नहीं होगा, बल्कि प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण के जरिए नर्मदा का जल आगे बढ़ेगा।
मुश्किल हालात में पूरी हुई इंजीनियरिंग चुनौती
इस परियोजना को पूरा करना इंजीनियरों और श्रमिकों के लिए आसान नहीं था। पहाड़ों के भीतर खुदाई के दौरान पानी का रिसाव, चट्टानों की कठोरता, मलबा गिरने और तकनीकी बाधाओं जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।
कई बार भूजल के कारण काम रोकना पड़ा और लगातार पंपों की मदद से पानी बाहर निकाला गया। सुरंग के अंदर काम करने वाले कर्मचारियों को लंबे समय तक प्राकृतिक रोशनी से दूर रहकर काम करना पड़ा।
कठिन परिस्थितियों के बावजूद इंजीनियरों और मजदूरों की मेहनत से यह परियोजना पूरी हुई है। अब नर्मदा का पानी सोन क्षेत्र तक पहुंचाने का रास्ता पूरी तरह तैयार हो चुका है।
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