मुंबई। भारत में शायद ही ऐसे राजनेता होंगे, जो सुबह छह बजे से ही अपने कामकाज के लिए तैयार हो जाएं और अपने कार्यकर्ताओं और अधिकारियों से भी इतनी जल्दी मिलने का समय तय करें। महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ के नाम से मशहूर अजित पवार अपनी इसी विशेषता के लिए जाने जाते थे।
हाल ही में हुए नगर परिषद चुनाव में बारामती के पुनः नगराध्यक्ष बने सचिन सातव बताते हैं कि जब दादा बारामती में रहते थे, तो सुबह-सुबह ही नगर के किसी न किसी कोने में चल रहे विकास कार्यों का जायजा लेने निकल जाते थे। उनके इस नियम का असर यह था कि स्थानीय अधिकारी और कर्मचारी समय पर पहुंचकर काम में लग जाते थे।
मुंबई में उनके सरकारी आवास पर भी यही अनुशासन था। पवार स्वयं सुबह छह बजे तैयार हो जाते थे और उनके विभाग के अधिकारी भी पहले से तैयार रहते थे, क्योंकि कभी भी उपमुख्यमंत्री उन्हें बुला सकते थे।
ग्रामीण राजनीति और राजकोषीय विशेषज्ञता
छह बार उपमुख्यमंत्री रह चुके अजित पवार न सिर्फ वित्तीय नीतियों के विशेषज्ञ थे, बल्कि ग्रामीण विकास और सहकारी क्षेत्र के भी गहरे जानकार थे। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने कई सरकारों में यह सुनिश्चित किया कि किस मद में कितनी राशि खर्च की जाए।
उनका राजनीतिक सफर 1982 में एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड सदस्य के रूप में शुरू हुआ। इसके अलावा महाराष्ट्र के सहकारी बैंक क्षेत्र में भी उनका व्यापक प्रभाव रहा। उनकी सहकारिता क्षेत्र की समझ को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह भी मान्यता दे चुके हैं। माना जाता था कि 2023 में शिंदे सरकार में उन्हें शामिल करने के पीछे भाजपा की रणनीति यह भी थी कि सहकारिता क्षेत्र में उनकी मदद से संबंध मजबूत किए जा सकें।
नशे के सख्त विरोधी
अजित पवार स्वयं किसी भी तरह के नशे से दूर रहे। उनके चाचा शरद पवार के मुख कैंसर और स्वास्थ्य के अनुभव ने उनके नशा विरोधी रुख को और मजबूती दी। तंबाकू, गुटखा, पान आदि का सेवन करने वालों को वह सार्वजनिक रूप से डांटने से नहीं चूकते थे।
पूर्व गृह एवं उपमुख्यमंत्री आर.आर. पाटिल को भी कैंसर ने जीवन से विदा लिया था। पाटिल की बीमारी सामने आने से पहले, अजित पवार ने उम्र में उनसे कम होने के बावजूद कई मौकों पर उनकी तंबाकू की आदत के लिए सार्वजनिक रूप से उन्हें फटकार लगाई थी।
‘दादा’ के ये गुण और अनुशासन उनके समर्थकों और अधिकारियों में गहरी छाप छोड़ गए और महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी पहचान के स्थायी प्रतीक बन गए।